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Saturday, December 11, 2010
दंगा कोई भी करे, दर्द तो घर की महिला को ही मिलेगा
अब मध्यप्रदेश में भी सब कुछ ठीक नहीं है
मप्र में शिवराज सिंह चौहान उम्दा काम कर रहे हैं, लेकिन कहीं न कहीं उनकी आंख से चूक हो रही है। भूमिका कलम की ये खबर मध्यप्रदेश में गरीबों के साथ होने वाली घटनाओं को छोटा सा नमूना भर है। इसके पहले रायसेन जिले के औबेदुल्लागंज ब्लॉक में भी ऐसा ही हुआ था। बात केवल मुस्लिमों की ही नहीं है, बल्कि हर वो आदमी पुलिस से पीडि़त है जो आम है और वो किसी अपराध का शिकार हो गया है।
Saturday, November 13, 2010
आज खुशवंत सिंह की वजह से एक नया ज्ञान मिल गया है
राधे-यार भीम तुम्हे मालूम है कि वाइन, विस्की, वोदका, मॉल्ट, स्कॉच और रम में क्या अंतर होता है।
भीम-यार कभी इस बारे में सोचा नहीं।
राधे-लेकिन मैं इस बारे में जानना चाहता हूं।
भीम-अचानक दारू के प्रकारों के बारे में जानने का विचार कैसे आ गया।
राधे-खुशवंत सिंह की वजह से।
भीम-खुशवंत सिंह!
राधे-अरे आज दैनिक भास्कर के संपादकीय पेज पर उनका आर्टिकल छपा है और एक जगह उन्होंने जिक्र किया है कि एक कार्यक्रम में मेरे यहां आने वालों से पूछा कि वे लोग क्या लेना पसंद करेंगे। स्कॉच, वाइन, वोदका या अन्य कोई। तो उन्होंने मना कर दिया कि कोई नहीं।
बस इस आर्टिकल को पढ़कर लगा कि आखिर इन सब में अंतर क्या होता है?
भीम-चिंता की कोई बात नहीं। अभी पूछे लेते हैं किसी से।
भीम फोन से मोबाइल नंबर डायल करते हैं
सामने से एक आवाज गूंजती है जो कि सुनील नामक पत्रकार की थी।
भीम-हां जी भीमसिंह बोल रहा हूं। कल आप याद कर रहे थे आज हमने याद कर लिया।
सुनील-खुशकिस्मती हमारी। याद करते रहना चाहिए। बताए कुछ खास।
भीम-मुझे वोदका, वाइन, व अन्य शराबों में अंतर जानना है।
सुनील-ठीक है इसके लिए एक ही आदमी सबसे बेहतर हैं और वो अपने बॉस। अभी बात कराता हूं।
बॉस-क्या हाल है मीणा जी। बहुत दिनों बाद याद किया।
भीम-बस सर काम चल रहा है। आपसे ज्ञान लेना है।
बॉस-बताए।
भीम-वाइन, वोदका, स्कॉच, मॉल्ट, विस्की और रम में क्या अंतर होता है?
बॉस-अचानक आज ये जानकारी लेने की क्या जरूरत पड़ गई। क्या कोई खबर बना रहे हो?
भीम-नहीं, बस यूं ही सामान्य ज्ञान बढ़ाने के लिए।
बॉस-ठीक है।
वाइन अंगूर से बनती है।
मॉल्ट में फ्लेवर मिला होता है और एक तरह से इसे विस्की भी कह सकते हैं। जैसे पीटर स्कॉच और रेड नाइट।
वोदका व्हाइट कलर की होती है जिसमें स्मैल कम आती है।
स्कॉच 12 साल से पुरानी शराब को कहते हैं और स्कॉच की बोतल पर बराबर लिखा रहता है।
भीम-जानकारी के धन्यवाद
राधे-क्या बताया।
भीम-ये पढ़ो।(कागज राधे की तरफ बढ़ाया)
राधे-ये जानकारी तो जबरदस्त है। आज खुशवंत सिंह की वजह से एक नया ज्ञान मिल गया।
Thursday, April 29, 2010
ये तो कुछ भी नहीं.....
भोपाल। जबलपुर से एक रिपोर्ट भड़ास4 media par प्रकाशित हुई है की जबलपुर के कलेक्टर ने पत्रकारों को अपमानित करने वाली टिप्पणी की है. यु तो मामला गंभीर है लेकिन मध्य प्रदेश की पूरी स्थिति देखें तो हर दिन एक वाकया मिल जायेगा। ये तो कमिश्नर हैं, यहाँ के तो एसडीएम भी सवाल पसंद नहीं आने पर नए पत्रकारों से कह देते हैं की पहले सवाल करना सीख लो। इतना ही नहीं दैनिक भास्कर भोपाल के फोटो जर्नलिस्ट ने जब कुछ किसानों के साथ जाकर उनकी समस्या ओबेदुल्लागंज ब्लाक( ये मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में) के एसडीएम संजय सिंह के सामने रखी तो उन्होंने फोटो जर्नलिस्ट को दलाल कह दिया। इस टिप्पणी का मकसद किसी को आहत करना कतई नहीं है, लेकिन मध्य प्रदेश में पत्रकारों के अपमान की बानगी जरुर है।
ये है वो खबर
पत्रकारों से बोले कमिश्नर- चुल्लू भर पानी में डूब मरो
पत्रकारों के सवालों से झल्लाए जबलपुर के कलेक्टर ने पत्रकारों को चुल्लू भर पानी में डूब मरने की नसीहत दे डाली. उन्होंने ये बात उस समय कही जब पत्रकार शहडोल संभाग के कमिश्नर हीरालाल त्रिवेदी से उनकी नयी कार के बारे में पूछ रहे थे. मामला उस समय हुआ जब मध्यप्रदेश के वित्त मंत्री राघव जी जबलपुर में जबलपुर, शहडोल और रीवा संभाग की समीक्षा बैठक लेने आये थे.इस समीक्षा बैठक में शहडोल संभाग के कमिश्नर हीरालाल त्रिवेदी बिना नंबर की लक्जरी फोर्ड इन्डिवर वाहन में जबलपुर आये थे. जब ये बात पत्रकारों को पता चली तो उन्होंने वित्त मंत्री के जाते ही कमिश्नर साहब को घेर लिया और उनसे इस लक्जरी फोर्ड इन्डिवर वाहन के बारे में सवाल दाग दिए. कमिश्नर साहब अपना बचाव करते हुए कहने लगे की सरकार ने ये सुविधा राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत कलेक्टर और कमिश्नर को प्रदान की है. इसी कारण इस सुविधा का लाभ हम उठा रहे हैं. ये बात जबलपुर कलेक्टर गुलशन बामरा को ठीक नहीं लगी और उन्होंने पत्रकारों को नसीहत देते हुए कहा की इस तरह के सवाल आप लोगों को यहां नहीं करने चाहिए. कमिश्नर साहब हमारे मेहमान है और उनसे इस तरह के आप लोग सवाल कर रहे हैं. आप लोगों को तो चुल्लू भर पानी में डूब जाना चाहिए.
अब साहब, कमिश्नर साहब आपके मेहमान हैं, और पत्रकार उनसे सवाल पूछ रहे हैं, और उन्हें इसका जवाब देने में कोई दिक्कत नहीं हो रही है, तो आपको ख़राब बिल्कुल नहीं लगना चाहिए.
इधर शहडोल कमिश्नर हीरालाल त्रिवेदी ने ये भी कहा कि सरकार ने 15 हज़ार रुपये किराये पर कोई भी वाहन लेने के लिए कहा है. लेकिन अब सवाल उठता है कि क्या 15 हज़ार रुपये में लक्जरी फोर्ड इन्डिवर वाहन किराये पर मिल सकता है. क्योंकि इस वाहन का एवरेज ही 6-8 प्रति किलोमीटर है. प्रदेश के वित्त मंत्री राघव का कहना है कि प्रदेश पर बहुत ढेर सारा कर्ज का बोझ है पर कमिश्नर साहब लक्जरी कार में घूम रहे हैं.
जबलपुर से आशीष विश्वकर्मा की रिपोर्ट
साभार-bhadas4media
Tuesday, April 27, 2010
संजीवनी
मन की स्वरलहरिया का स्वरूप हो तुम,
विचारों के आवेग में बसने वाले,
मेरी अभिव्यक्ति, मेरी अनुभूति का अभिप्राय हो तुम,
तीव्र तृष्णा के बीच में अतृप्त सा मन,
मन की मृग-तृष्णा को दूर करने का आधार हो तुम,
नहीं लांघना मर्यादाओं की लक्षमणरेखा,
मेरे लिए जीवन का अटल सत्य हो तुम,
मन के प्रवाह पर एकाधिपत्य है तुम्हारा,
मन जीवन की स्वर्ण जड़ित पतवार हो तुम,
जीवन बेला में कुछ भी असंभव नहीं लगता,
मेरे लिए प्राणवायु और संजीवनी से बढकर हो तुम।।
डॉ.सुरेन्द्र मीणा
डी/16, बिरलाग्राम नागदा जंक्शन, जिला उज्जैन(मध्य प्रदेश)
मोबाइल-09827305628
(डॉ सुरेन्द्र मीणा पेशे से एक कालेज में प्रोफ़ेसर हैं। साहित्य में विशेष रूचि रखते हैं और नागदा में होने वाले सामाजिक कार्यक्रमों में भी बढ चढ़कर हिस्सा लेते हैं।)
Monday, April 26, 2010
मेरी बीबी अली बाबा चालीस चोर पड़ रही है
दरअसल हुआ यूं की कुछ साहित्यकार काफी हॉउस में चाय की चुस्कियों के बीच पुस्तक चर्चा कर रहे थे।
एक ने कहा-पुस्तकों का जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है।
दुसरे ने सहमत होते हुए कहा-जैनेन्द्र कुमार ने साहित्य का श्रेय और परे में ठीक ही लिखा है की एक कहानी से या पुस्तक से कुल मिलकर एक प्रभाव पड़ना चाहिए।
सो कैसे? " तीसरे ने पूछा"
जब मेरी पत्नी गर्भवती थी तो वह सुरेन्द्र शर्मा का उपन्यास 'दो मुर्दों के लिए गुलदस्ता' पड़ रही थी और उसने दो मृत जुड़वां बच्चों को जन्म दिया।" पहले ने कहा।
"मेरी पत्नी गर्भवती होने के समय जेरोम के जेरोम का उपन्यास ' थ्री मेन इन ए बोट' पड़ रही थी और उसने तीन बच्चों को एक साथ इलाहाबाद में नाव में उस समय जन्म दिया जब हम लोग 'संगम स्नान' के लिए जा रहे थे, " दूसरे ने कहा।
यह सुनते ही तीसरा व्यक्ति गश खाकर कुर्सी से नीच गिरकर बेहोश हो गया। लोगों ने उसे उठाकर कुर्सी पर बैठाया और उसे किसी प्रकार होश में लाएउसके सामान्य होने पर लोगों ने उससे पूछा, " क्यों क्या हुआ? ठीक तो हो न?"
तब उसने कहा, " मैं तो ठीक हूँ लेकिन मेरी पत्नी गर्भवती है और आजकल वह' 'अलीबाबा चालीस चोर' पड़ रही है।
Tuesday, April 20, 2010
माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्व विद्यालय में पीछे के दरवाजे से बडाये जाते हैं नंबर
Sunday, April 11, 2010
एमपी पोस्ट ने कराइ चुनाव प्रक्रिया पर चर्चा
डॉ न भास्कर राव
विशिष्ट वक्तव्य-
राज्यसभा सदस्य और भाजपा के प्रदेश उपाध्क्ष अनिल माधव दावे।
मध्य पदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता अरविन्द मालवीय।
इनके अलावा चुनाव प्रक्रिया को कवर करने वाले
पत्रकारों ने भई कार्यक्रम को संबोधित किया।
इनमें दैनिक भास्कर के स्टेट ब्यूरो चीफ श्री गणेश संकल्ले, स्टार न्यूज़ के विशेष संवाददाता श्री ब्रिजेश राजपूत, हिंदुस्तान टाइम्स के विशेष संवाददाता श्री रंजन श्रीवास्तव और इंडिया टुडे के प्रमुख संवाददाता अम्बरीश मिश्र शामिल थे।
Tuesday, April 06, 2010
पहली बार पत्रकार आये खुद के खिलाफ
भोपाल। आमतौर पर नेताओं, अफसरों और दूसरे के खिलाफ लिखने वाले खबरनवीश यानि पत्रकार अब पहली बार अपने खिलाफ खबर लिखने लगे हैं। देश में पेड न्यूज को लेकर मचे हंगामे के बाद लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभाओं के साथ–साथ पूरे देश में चौराहे–चौराहे पर चर्चा हो रही है। क्यों बिक जाते हैं अखबार मालिक? क्या कर रहे हैं पत्रकार? क्या देख रहे हैं संपादक? क्यों चुनाव के समय लाखों रुपए लेकर पाठकों को धोखा देते हुए गलत उम्मीदवारों को चुनाव जीताने के लिए सकारात्मक ही नहीं, चापलूसी की खबरें छापी जाती है।
पहले बार देश के दिग्गज पत्रकार प्रभाष जोशी ने पेड न्यूज के खिलाफ मोर्चा संभाला था। इसी बीच उनका निधन हो गया। प्रभाष जोशी और राजेंद्र माथुर जैसे पत्रकारों को समर्पित करते हुए इंदौर प्रेस क्लब ने ‘‘अपने गिरेबां में...’’ शीर्षक से स्मारिका का प्रकाशन किया है। जिसका विमोचन प्रेस कौन्सिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन न्यायमूर्ति जी.एन. रे, पद्मश्री अभय छजलानी, दैनिक भास्कर के समूह संपादक श्रवण गर्ग की मौजूदगी में गत दिनों में इंदौर प्रेस क्लब में किया गया स्मारिका के कवर पेज को खूबसूरत बनाते हुए पेन की नीब से रुपए गिरते हुए बताये गए हैं। कवर पेज पर ही लिखा है ‘‘एक चिंगारी कहीं से ढूंढ लाओं दोस्तो, इस दीये में तेल से भीगी हुई बाती तो है’’। स्मारिका में वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी, श्रवण गर्ग, डॉ. वेदप्रताप वैदिक, हरिवंश, अभय छजलानी, रामशरण जोशी, पुण्य प्रसून वाजपेयी, ओम थानवी, पंकज शर्मा, राजदीप सरदेसाई, मृणाल पांडे, सुचेता दलाल सहित 49 पत्रकारों और राजनेताओं के भी आलेख छापे गए हैं। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान, फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन, भाजपा नेता अरूण जेटली, दैनिक भास्कर के संचालक सुधीर अग्रवाल, राष्ट्र संघ भय्यू महाराज, पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, न्यायमूर्ति पी.वी. सांवत ने भी अपने विचार रखे हैं। पूरे देश में पहली बार निकली इस स्मारिका में छपे लेख पढ़कर पता चलता है कि पत्रकार अब अपने खिलाफ भी लिखने लगे हैं। अखबार मालिकों की चाकरी करने वाले संपादक जो अब अखबारों के लिए जनसंपर्क अधिकारी का रोल भी निभाते हैं। उन्होंने पेड न्यूज को सही और गलत दोनों बताया। इस स्मारिका में छपे लेख हम रोजाना अपनी वेबसाइट पर पाठकों और पत्रकारों के लिए प्रकाशित करेंगे। इस स्मारिका में छपे लेख पर हम पाठकों की प्रतिक्रिया भी चाहेंगे। कृपया आप अपनी प्रतिक्रिया हमें अवश्य भेजे।
Wednesday, March 10, 2010
क्या हैं अवधेश बजाज होने के मायने?
ब्लॉग की बात
कभी भई कोई बड़ा नहीं होता और न ही कोई एसा होता है की जिसके बिना काम रुक जाए। दरअसल हर शख्स का एक समूह होता है, जो उसके लिये सोचता है और कुछ करता भी है। कई बार ऐसा होता है की कोई व्यक्ति व्यवस्था पर भरी पड़ जाता है। ऐसे शख्स को अलग- अलग नामों से भी जाना जाता है। कभी-कभी ऐसे शख्स को लेकर बहस छिड़ जाती है और उसमें शामिल होते हैं ब्लॉगर। भोपाल से संचालित दखल ने हल ही में पीपुल्स अख़बार के मीडिया सलाहकार बने अवधेश बजाज को लेकर एक आर्टिकल लिखा है। जिसे शहर भर में चटकारे लेकर पड़ा जा रहा है। इस आर्टिकल को लिखा है मोतीलाल ने। जो की दखल के नियमित लेखक हैं। पेश है हुबहू दखल का वह आर्टिकल। इसको पड़ने के बाद तय जनता खुद तय करे की क्या जो हुआ वह सही था?
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क्या किसी पत्रकार का ऐसा खौफ हो सकता हैं कि अगर किसी संस्था से जुड़े तो वहां का संपादक और पत्रकारिता की आड़ में तेल बेचने वाले और बस चलने वाले लोग मैदान छोड़ कर भाग जाएँ जी हाँ ऐसा ही हुआ हैं भोपाल के पीपुल्स समाचार में जब वहां वरिष्ठ पत्रकार अवधेश बजाज सलाहकार बन के पहुंचे तो संपादक राघवेन्द्र सिंह अपनी टीम सहित मैदान छोड़ कर भाग गए जो लोग अवधेश बजाज के साथ काम कर चुके हैं या उन्हें जानते हैं उन्हें पता हैं यह शख्स वर्कएडिक्ट हैं इसे काम का नशा इतना हैं कि १२ से १८ घंटे तक कुर्सी पर बैठकर काम करना इसे आता हैं यह अख़बार के पन्ने के तेवर और कलेवर दोनों को बदलना जनता हैं, यही वजह हैं कि अवधेश बजाज के विरोध में तमाम वे लोग खड़े मिल जायेंगे जो पत्रकारिता कि आड़ में छोड़ पत्रिकारिता सब कुछ करते देखे जा सकते हैं बजाज ने बीस सालों में कई संस्थानों को जमीन से उठा के खड़ा किया और जब बजाज वहां से निकले तो वे संसथान वापस जमीन पर लेटे नजर आए आप को यकीन न हो तो भोपाल नवभारत और जागरण का हश्र देखा जा सकता हैं बजाज ने इन दोनों अख़बारों को जिस बुलंदियों पर पहुचायां था वो काम उनके बाद न तो मलय श्रीवास्तव के बूते का था ना पंकज पाठक के और ना ही मृगेंद्र सिंह के बजाज की चर्चा हम यहाँ पीपुल्स समाचार को लेकर कर रहे हैं बजाज की आमद के बाद इस अख़बार में जो परिवर्तन आयें हैं वे उसे अचानक दैनिक भास्कर के समकक्ष ले आयें हैं बजाज पीपुल्स संभालेंगे इस खबर ने ही कई लोगो का हाजमा बिगड़ दिया, भोपाल में बंडी और चश्मा पहन कर कई धंधे बाज बुद्धिजीवी पत्रकार बन गए हैं ऐसे ही एक बुद्धिजीवी भोपाल के चारइमली इलाके में बजाज को कोसने में लगे हैं इन साहब ने अपने कुछ दलाल साथियों के जरिये पीपुल्स के मालिकान तक खबर भेजी कि जिसे रख रहे हो वो शेर नहीं दीमक हैं अब सवाल उठता हैं अवधेश बजाज शेर हो या दीमक भाई तेरे पेट में क्यूँ दर्द हो रहा हैं यह बंडीबाज पत्रकार अकेले नहीं थे जिनके पेट में बजाज ने जुलाब का काम किया हैं ऐसे न जाने कितने बहरूपिये पत्रकार हैं जो बजाज के पासंग भी नहीं हैं लेकिन उनके बारे में बकवास जरुर करते हैं एक और चरित्रहीन पत्रकार भोपाल में हैं जिन्हें दो सालों में दो बार महिलाओं के जूते खाने पड़े हैं इनका मुख्य काम दलाली हैं इन्हें भी अवधेश बजाज से खासी परेशानिया हैं इन्होने पीपुल्स खबर भिजवाई कि गलत आदमी को रख रहे हो लेकिन कहते हैं हाथी की मदमस्त चल पर कुत्तों के भोंकने का असर नहीं होता ...... और यही हुआ , बजाज पूरी मस्ती से अपने काम में लगे हैं यहाँ बता देना जरुरी हैं बजाज को कोसने वाले दूसरे साहब दो साल पहले एक स्टिंग ओपरेशन में फंस गए और पत्रकार के रूप में छुपा औरतखोर सबके सामने आ गया तब यह चरित्रहीन सबसे पहले अवधेश बजाज के ही चरण चुम्बन करने पंहुचा था बजाज ने जब ऐसे घटिया आदमी का साथ देने से मना किया तो यह उनके विरोधी हो गए हालाँकि बजाज सामने हो तो यह चाँद लम्हों में अपना पेंट गीला कर लेता हैं बजाज के किस्से का हाल भी उस कहावत जैसा हो गया हैं कि "सूप बजे तो बजे यहाँ तो सौ छेद वाली चलनिया भी बज रही हैं " अवधेश बजाज का खबरों के प्रति समर्पण और काम करने का विशिष्ठ अंदाज उन्हें तमाम लोगो से अलग कर देता हैं यही वजह हैं कि वे अपने समकालीन पत्रकारों में एक अलग स्थान रखते हैं
बजाज कि नजर कुछ पंक्तियाँ ........
हमारी वफायें तुम्हारी जफ़ाओं के सामने
जैसे छोटा सा दिया तेज हवाओं के सामने
नेज़े पर भी हमेशा बुलंद रहा सर मेरा
झुका नहीं कभी झूठे खुदाओं के सामने
मप्र विधानसभा में बढेगी पत्रकारों की सुविधा
भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा में अब पत्रकारों की सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा जाएगा। ये तय hua mangalwar ko विधानसभा में hui patrkar deergha samiti की baithak main। ये baithak mangalvar ko विधानसभा upadhyksh dr harvansh singh की adhykshta में sampann hui। harvansh singh ne kaha की विधानसभा ke covrage ke douran पत्रकारों की सुविधाओं का paryapt ध्यान रखा jaana chahiye। unhe kisi tarh की pareshani nahi hona chahiye। unhone kaha की niymit roop se nikalne vaale samachar patron ke pratinidhiyon ko hi patrkar deergha ke pravesh patr prdan kiye jaaye। is avsar par पत्रकारों ke sthai photo yukt prvesh patr jaari karne ke maapdand neeti sambandhi prkriya ke niytan v naveen aavedan patron par vichar kar nirnay lene ke liye 6 sadsyeey up samiti का gathan kiya gaya।
is baithak में bani us samiti में patrika ke state beuro cheif dhanjay prtap singh, star news ke brijesh rajput, sharad dwedi, dinesh nigam, ranjan shrivastav ke saath saaini ks shamil hain। paden sachiv suchna adhikari deepak duby honge। samiti dus din में apna prtivedan patrkar deergha salahkar samiti ko soupegi।
पत्रकारिता के पर्चे में पकड़े गए नकलची
अपात्र करा रहे परीक्षा
विश्वविद्यालय ने परीक्षा कक्ष में वीक्षक की डच्यूटी के लिए जिन कर्मचारियों को नियुक्त कर रखा है, वे इसकी पात्रता ही नहीं रखते हैं। परीक्षा कक्ष में पत्राचार संस्थान में टच्यूटर किरण त्रिपाठी, शारीरिक शिक्षा संस्थान में कोच के पद पर पदस्थ नितिन गरुड़, खेल अधिकारी खलील खान वीक्षक की डच्यूटी कर रहे हैं।
कोई जवाब नहीं
कुलसचिव डॉ. संजय तिवारी ने कहा कि संबंधित विषय के शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं इसलिए उन्हें समन्वयक बनाया गया है। हालांकि अन्य सवालों पर वे चुप्पी साधे रहे।
Wednesday, February 17, 2010
टीवी न्यूज़ चैनल करेंगे IPL-3 का बॉयकाट
इंडियन प्रिमियर लीग के आयोजकों द्वारा टीवी चैनलों के लिए फुटेज की अवधि कम करने से इलेक्ट्रानिक मीडिया ने तीखी प्रतिक्रिया की है। चैनलों के संगठन न्यूज ब्रॉडकास्टर्स असोसिएशन ने आईपीएल-3 के मैचों का बहिष्कार करने का फैसला लिया है।
आईपीएल मैचों के आधिकारिक प्रसारक सेट मैक्स ने कवरेज को लेकर एनबीए की शर्तों को मानने से साफ इनकार कर दिया। इसका असर ये होगा कि अब आईपीएल के मैचों की फुटेज और उनका विश्लेषण टीवी न्यूज़ चैनलों पर नहीं दिखेगा।
टीवी फुटेज के मसले पर आईपीएल अध्यक्ष ललित मोदी ने चैनलों के किसी फोन कॉल का जवाब तो नहीं दिया पर सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर के ज़रिये कहा है, आईपीएल मैचों के सीधे प्रसारण का अधिकार सिर्फ सेट मेक्स के पास है। आईपीएल से जुड़ी खास खबरों के लिए दर्शक हमारी वेबसाइट IPLT20.com पर क्लिक कर प्राप्त कर सकते हैं।
आईपीएल के नवीन मीडिया नियमों के अनुसार हर न्यूज़ चैनल आईपीएल मैचों की फुटेज एक दिन में सिर्फ सात मिनट के लिए दिखा सकेगा। और ये फुटेज भी लाइव मैच से आधे घंटे बाद की होगी। साल 2008 में टीवी चैनल लाइव मैच से पांच मिनट बाद की फुटेज दिखा सकता था।
Tuesday, February 16, 2010
इतिहास में 16 फरवरी
Saturday, February 13, 2010
कहीं शिवसेना खान को प्रमोट तो नहीं कर रही थी?
में पत्रकार हूँ और किसी घटना पर एकदम विश्वास करना मेरी आदत नहीं है। खासतौर से तब जब मामला राजनीति और आर्थिक मामलों का हो। हालिया मामला फिल्म माय नेम इस खान का है, जो अभी न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतर्राष्ट्रीय खबर बनी हुई है। इस फिल्म का शिवसेना ने जमकर विरोध किया और जनता को भई धमकाया की अगर वे फिल्म देखने गए तो ठीक नहीं होगा। ये भी कहा की फिल्म को किसी भी हालत में चलने नहीं देंगे। लेकिन हमारे देश की जनता ने एक बार फिर शिवसेना को करार जवाब दिया। हालाँकि शिवसेना में एसा कुछ नहीं जिसके लिए जनता को चिंता करने की जरुरत नहीं थी। लेकिन देश के न्यूज़ चैनल ने जनता को एसा करने के लिए मजबूर कर दिया। पुरे देश की जनता महंगाई समेत तमाम समस्यों को भूल चुकी थी और सभी को एक ही चिंता खाए जा रही थी की माय नेम इस खान जरुर लग जाए वर्ना देश का क्या होगा। भले एक वक़्त चाय नहीं पियेंगे लेकिन फिल्म देखने जरुर जाना है। महाराष्ट्र सरकार समेत देश के अन्य राज्यों की सरकार भई इसी काम में जुट गयी और १२ दिसंबर को हर सिनेम्घर पर पुलिस का मजमा था। एक तरफ भरी भीड़ और दूसरी तरफ चाँद शिवसैनिक और बीच में पुलिस। शिवसैनिक केवल नारेबाजी करती रही और फिल्म शुरू होते ही तमाम फुरसतिया नोजवान जो शिवसैनिक बनकर आये थे अपने-अपने घर या फिर फिल्म देखने चले गए। सबसे बड़ा सवाल ही ये की शिवसेना के विरोध में कोई दम नहीं दिखा और इससे भी बड़ी बात की जेसे फिल्म रिलीस हुई शाहरुख़ ने तत्काल ट्विटर पर जाकर माफ़ी मांग ली और कुछ देर बाद बल ठाकरे ने भी अपने कार्यकर्ताओं को बधाई दे दी। यानि अब सब कुछ शांत हो गया। न कोई हंगामा और न कोई विरोध फिल्म हित हो गयी।
Sunday, January 24, 2010
नए प्रेस कानून की तैयारी
प्रेस कानून बदलने का वक्त करीब आ रहा है । भोपाल में पिछले दिनों हुई एक संगोष्ठी में यह बिन्दु पूरी गंभीरता से उठा था कि आजादी के छह दशक के बाद स्वतंत्र भारत में समाचार पत्र - पत्रिकाओं का नियमन अब भी जिस अधिनियम से हो रहा है, वह प्रेस और पुस्तक पंजीकरण अधिनियम वर्ष १९६७ का है । अंग्रेजकाल के अधिनियम की धाराओं में भी सामान्य परिवर्तन के अलावा कुछ खास नहीं बदला गया है । पिछले २७ वर्षो में तो इसमें नाममात्र का भी परिवर्तन नहीं हुआ है । अब यह सुयोग बना है कि राज्यों के सूचना मंत्रियों के पिछले माह दिल्ली में हुए सम्मेलन में नए प्रेस अधिनियम के प्रारूप पर विचार हुआ है । इसे नए नाम से और नए सिरे से प्रारूप तैयार करने की वर्षो पुरानी अपेक्षा पूरी होने की दशा में देरी से ही सही, ठोस कदम उठा है । प्रस्तावित अधिनियम के प्रारूप की कमियां विचार-मंथन से दूर की जा सकती है । हारे देश में किसी भी समाचार-पत्र या अन्य नियतकालिक पत्र-पत्रिका के प्रकाशन के पूर्व की औपचारिकताएं इस अखिल भारतीय अधिनियम के अन्तर्गत ही आती हैं । शीर्षक आवंटन से लेकर उसके रजिस्ट्रेशन और नियमितता संबंधी प्रक्रिया का ब्यौरा इसमें है । पूरे देश के लिए समाचार-पत्रों का एक ही पंजीयक होता है । मूल रूप से अंग्रेजों के बनाए हुए इस कानून के अंतर्गत पंजीयक का प्रचलित नाम ÷आरएनआई' है । १८६७ में प्रेस की जानकारी रखने के लिए सर्वप्रथम यह कानून बनाया गया था । बाद में प्रेस को दबाने के लिए वायसराय लायटन के समय १८७८ का बदनाम वर्नाकुलर प्रेस एक्ट बना । भाषाई समाचार-पत्रों को दबाने के लिए लाया गया यह कानून इंग्लैंड में सत्ता परिवर्तन के बाद १८८१ में रद्द किया गया और १८६७ वाले कानून को ही जारी रखा गया ।
स्वतंत्र भारत में समाचार पत्रों के नियमन में भी यह कानून सफल रहा, इसमें संदेह के कई कारण हैं । समाचार-पत्रों के प्रकाशन की अगंभीर बढ़त, अपात्रों का प्रकाशन कर्म और ऊटपटांग शीर्षकों के लिए बहुत हद तक मौजूदा कानून को ही जिम्मेदार माना जाता है । इसलिए इस अधिनियम का फिर से प्रारूप तैयार करने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी । वर्ष १९५२ में बने प्रथम प्रेस आयोग ने इस अधिनियम के बारे में विचार किया था । आयोग की कुछ सिफारिशों को लागू भी किया गया । समाचार पत्रों के लिए रजिस्ट्रार की नियुक्ति इन सिफारिशों में से एक थी । १९७८ में बने द्वितीय प्रेस आयोग ने भी कई सुझाव दिए । इन्हें अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका । इनमें से कुछ परिभाषाएं आदि अब नए प्रारूप में ली गई हैं । हालांकि उनमें नई व्याख्याएं भी हैं । नए कानून को द प्रेस एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ पब्लिकेशंस एक्ट का नाम दिया जाएगा । बुक्स (किताबों) को इस अधिनियम की परिधि से बाहर करना प्रस्तावित किया गया है । सभी नियतकालिकों को प्रकाशनों (पब्लिकेशंस) में समाहित करते हुए समाचार पत्र, पत्रिका, जर्नल, न्यूज लेटर को अलग-अलग परिभाषित किया गया है । शीर्षक सत्यापन का नया प्रावधान इसमें शामिल किया गया है । इसके तहत अवयस्क, संज्ञेय अपराधों में सजायाफ्ता और जो भारत का नागरिक नहीं है, वे कोई प्रकाशन नहीं कर पाएंगे । प्रसार संख्या के सत्यापन के लिए भी वैधानिक प्रावधान किए गए हैं ।
प्रस्तावित नए प्रेस कानून में संपादक की परिभाषा में शैक्षणिक योग्यता को जोड़ा गया है । वर्तमान अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था । यह एक अच्छा प्रावधान है, लेकिन इसे प्रस्तावित संशोधनों में स्पष्ट नहीं किया गया है । शीर्षकों के सत्यापन नाम से नया प्रावधान किया गया है । इस धारा में शीर्षकों का सोद्देश्य और अर्थपूर्ण होना भी जोड़ा जाना चाहिए । प्रस्तावित अधिनियम के उल्लंघन पर आर्थिक दंड बढ़ाया गया है।
आशा की जा सकती है कि नए प्रेस कानून की सूरत और सीरत प्रेस और देश के लिए शुभ होगी । प्रेस संबंधी मौजूदा परिदृश्य के दृष्टिगत तीसरे प्रेस आयोग की स्थापना के लिए भी यह उपयुक्त समय है ।
(लेखक मध्यप्रदेश सूचना एवं जनसंपर्क विभाग में अतिरिक्त संचालक हैं)
sabhar दखल