Friday, December 18, 2009

बालीवुड पर भारी जेम्स कैमरान का अवतार

भोपाल। इस शुक्रवार एक बार फ़िर बालीवुड पर हालीवुड भारी पड़ा। ऐसा लगता है की बालीवुड को भी जेम्स कैमरान का अवतार चाहिए, क्योंकि बालीवुड की एक साल की कोशिश पर हालीवुड की कोशिश भारी पड़ जाती है। अवतार नाम की जो फ़िल्म आज रिलीस हुई उसने दर्शकों को दोबारा आने के लिए आमंत्रित कर दिया है। लंबी प्रतीक्षा के बाद जेम्स कैमरान विज्ञानं फंतासी लेकर आए हैं, जिसने दर्शकों के थोड़ा रूककर अभिभूत कर दिया। गौरतलब है की जेम्स कैमरान ने दर्शकों से वादा किया था की वे हैरान के देने वाले होंगे और आज उन्होंने वादा निभाया। यह एक विशेष फिल्म है जो दर्शको के साथ-साथ आलोचकों के भी रोमांचित करती है। सबसे अच्छी बात ये है की मूर्खतापूर्ण हँसी और फूहड़ दृश्यों से दर्शकों को दूर रखा गया है, क्योंकि कुछ दिनों से हालीवुड वाले भी भारत को ध्यान में रखते हुए बेहूदा हास्य डालने लगे हैं। जैसा टीवी पर दर्शक ट्रेलर देखते हैं वेसे ही मजे उसे सिनेमा में फ़िल्म देखने पर भी आता है। शुरुआत में जरुर फ़िल्म थोड़ा स्लो चलती है है, लेकिन बाद में जेसे फ़िल्म गति पकती है तो दर्शकों में रोमांच जाग जाता है।
कहानी-पेन्डोरा गृह जिसका एक किलो का पत्थर एक करोड़ रूपये में बिकता है। उसी पत्थर की खोज एक व्यापारी को पेन्डोरा गृह ले आती है। लेकिन पेन्डोरा रहने वाले जीव उनके लिए समस्या हैं। इस समस्या से पार पाने के लिए व्यापारी जान नमक एक विकलांग सैनिक को चुनता है और जान पेन्डोरा गृह के निवासियों में घुलने मिलने में कामयाब हो जाता है। जान का काम था की वह पेन्डोरा के निवासियों को ये बात बता दे की उन्हें पेन्डोरा के गाँव ख़ाली करना है। लेकिन जान को पेन्डोरा के सरदार की लड़की से प्यार हो जाता है। इस दौरान व्यापारी पेंडोरा पर हमला करने की तय्यारी कर लेता है इस बात की भनक सिम को लग जाती हैफ़िर शुरू होता है जबरदस्त रोमांच जो की फ़िल्म खत्म होने के बाद दर्शकों के सीने में चलायमान है। कुल मिलाकर एक अवतार की आंखों के माध्यम से प्राकृतिक और अप्राकृतिक चमत्कार के अंतहीन, लुभावनी संग्रह को पेश किया, गया है। सभी अलौकिक तरलता के साथ प्रदान की गई है। पेंडोरा अनगिनत पशु प्रजातियों में से एक है और हम अपने हाथों पर एक प्रामाणिक क्लासिक फिल रख सकते हैं। अवतार, कहानी और चरित्र के विकास में बाधा के रूप में इलाज कर रहे हैं, कथा ब्रश कि स्पष्ट किया जाना चाहिए की जेब को अगले असाधारण व्यापक सेट टुकड़ा के निर्माण के लिए रास्ता बनाने में कटौती। और फिर भी, उसकी खामियों के बावजूद, अवतार उन में से एक अत्यंत दुर्लभ मामलों में प्रतिनिधित्व करता है जो पदार्थ पर शैली की जीत - और एक भूस्खलन से. इस फ़िल्म में जिनको अभिनय दिखने का मौका दिया उन्होंने थोड़े समय में भी अपना कमल दिखा दिया। दिक्कत है तो केवल एक की फ़िल्म को बेहतर ढंग से समझने के लिए दो बार देखना पड़ेगी। भोपाल के रम्भा, संगम, और एक एनी सिनेमा ये फ़िल्म लगी और क्रिकेट मैच होने के बावजूद फ़िल्म को दर्शक मिले।

Monday, December 14, 2009

मजाक बन गई मप्र सरकार की राजेन्द्र माथुर फैलोशिप

प्रारंभिक दौर में गरिमा के साथ सुयोग्य पत्रकारों को दी गई यह फैलोशिप ताजा दौर में रेवडी की भांति चीन्ह-चीन्ह कर दी जा रही है। दुख तो यह है कि फैलोशिप देने वाले और पाने वाले के अलावा शायद ही कोई जान पाता हो कि मूर्धन्य पत्रकार स्वर्गीय श्री माथुर के नाम पर कोई राष्ट्रीय फैलोशिप भी दी जा रही है।
राजेन्द्र पाराशर
भोपाल। लब्ध प्रतिष्ठित पत्रकार स्वर्गीय राजेन्द्र माथुर के नाम पर मध्यप्रदेश सरकार द्वारा प्रारंभ की गई फैलोशिप अब मजाक बनकर रह गई है. सौम्य और शालीन पत्रकारिता के प्रतीक स्वर्गीय श्री माथुर के नाम पर दी जाने वाली फैलोशिप वर्तमान दौर में निहित स्वार्थों की राजनीति के चलते अपने-अपनों को उपकृत करने का जरिया बन गई है. नईदुनिया और नवभारत टाइम्स जैसे सुप्रतिष्ठित अखबारों के संपादक रहे और पत्रकारों की संस्कारित पीढी तैयार करने वाले स्वर्गीय श्री माथुर ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उनके नाम का इस तरह मखौल उडाया जाएगा अथवा उनके नाम पर फैलोशिप स्थापित कर इस प्रकार उनकी छीछालेदर की जाएगी. प्रारंभिक दौर में गरिमा के साथ सुयोग्य पत्रकारों को दी गई यह फैलोशिप ताजा दौर में रेवडी की भांति चीन्ह-चीन्ह कर दी जा रही है. दुख तो यह है कि फैलोशिप देने वाले और पाने वाले के अलावा शायद ही कोई जान पाता हो कि मूर्धन्य पत्रकार स्वर्गीय श्री माथुर के नाम पर कोई राष्ट्रीय फैलोशिप भी दी जा रही है. वर्तमान में फैलोशिप के साथ योग्यता के मापदंड भी बदल गये हैं. प्रदेश में जब सरकार कांग्रेस की थी तो फैलाशिप पाने वाला अलग वर्ग हुआ करता था और भाजपा की सरकार आने के साथ योग्यता के मापदंडों में आरएसएस से जुडाव या उसके अनुमोदन की शर्त जुड गई है या जोड दी गई है. स्वर्गीय श्री माथुर के नाम पर जब इस फैलाशिप की शुरूआत हुइर्, तब सरकार की मंशा साफ थी, उसके मापदंड तय थे और योग्यता का भी पूरा-पूरा ख्याल रखा गया था.यहां तक की चयनकर्ता भी उतने ही तटस्थ रहे जिन्होंने हर बात पर फैलोशिप पाने वाले को परखा उसके बाद ही उसका चयन किया. यही वजह थी इस फैलोशिप की शुरूआत के समय जिन लोगों को यह दी गई वे योग्यता के आधार पर लब्ध प्रतिष्ठित पत्रकार थे. तब सरकार इस फैलोशिप की पूरी गरिमा भी बनाए हुए थी, साथ ही जिसे यह दी जाती थी उससे शर्तों के अनुसार पूरा कार्य भी कराया जाता था. इसकी गरिमा कुछ ऐसी बन गयी थी कि भव्य समारोह में जब उस लब्ध प्रतिष्ठित पत्रकार को यह फैलाशिप दी जाती थी तब उसे भी यह महसूस होता था कि पत्रकारिता के इस कठिनाईयों भरे सफर में उसने ऐसा कार्य किया है, जिसका प्रतिफल वह आज पा रहा है. इस प्रतिफल के रूप में उसे सरकार नवाज रही है और पूरा देश यह जान रहा है कि स्वर्गीय माथुर साहब के नाम को जीवित रखने के लिए कुछ कार्य हुआ है.आज जब हम वर्तमान में इस फैलाशिप के बारे में जानने की कोशिश करते हैं, तो ऐसा महसूस होता है कि वह केवल एक ऐसा हवा को झोंका था जो आया और अपने साथ सब कुछ उडा कर ले गया. यह सब केवल चार वर्षों तक ही ठीक-ठीक चला. याने वर्ष १९९६ से शुरू की गई यह फैलोशिप वर्ष २००० के बाद बंद सी हो गई थी. सबसे पहले इसे पाने वाले लब्ध प्रतिष्ठि पत्रकार थे श्री राजकिशोर, इसके बाद मध्यप्रदेश के श्री शिवअनुराग पटेरिया जिन्हें वर्ष १९९७ की फैलाशिप दी गई. इसके बाद १९९८ की फैलाशिप श्री हरीश पाठक को और वर्ष २००० में यह श्री उर्मिलेश को दी गई. वर्ष १९९९ में यह फैलोशिप किसी को नहीं दी. इसके बाद निरंतर तीन वर्षो याने वर्ष २००१ से २००३ तक ये फैलोशिप किसी को ही नहीं दी गई. राज्य में जब वर्ष २००३ में सत्ता परिवर्तन हुआ और बंद हुई इस फैलोशिप की ओर नजर गई तो सरकार ने इसकी शुरूआत की, पर पता ही नही चला की कब इसकी शुरूआत हो गई. इतना जरूर सुनने में आया कि वर्ष २००४ से २००७ तक लगातार यह फैलोशिप दी गई, मगर कब, किसने और किसे दे दी यह जानकारी किसी को नहीं. इसे हम शासकीय उपेक्षा या सरकार की बेरूखी ही कह सकते है, जो बंद फैलोशिप को शुरू तो की परन्तु इस तरह की किसी को इसकी जानकारी ही न हो. याने जिस प्रकार सरकार प्रारंभिक काल में इसके लिए प्रचार प्रसार करती थी, गरिमापूर्ण आयोजन होता था वह इसलिए कि और भी इस फैलोशिप के लिए प्रेरित हों, ताकि स्वर्गीय माथुर के नाम पर शुरू किया गया यह कार्य अनवरत उसी निष्ठा के साथ चलता रहे जिस निष्ठा के साथ श्री माथुर साहब पत्रकारिता करते रहे.वर्तमान में इस फैलोशिप के साथ सरकार की मंशा तो बदली साथ ही इस पर एक विचारधारा वाले समूह का कब्जा सा हो गया है. उन्हीं लोगों को इसके जरिए उपकृत किया जा रहा है जो उस विचारधारा से या उन विचारधारा वालों से जुडे हैं. फैलोशिप के नाम पर पत्रकारिता के क्षेत्र में स्थान तो दूर की बात है, परिचय के भी मोहताज लोगों को यह फैलोशिप मिल रही है. इसका उदाहरण है कि वर्ष २००४ से २००७ तक के लिए जिन लोगों को यह फैलाशिप उपकृत करने के लिए दी गई वे लब्ध प्रतिष्ठित पत्रकारों की श्रेणी में तो नजर नहीं आते हैं. वर्ष २००४ के लिए यह फैलोशिप कु. मोना बिल्लोरे, वर्ष २००५ के लिए श्री अंजनि कुमार झा, २००६ के लिए श्री सुरेश शर्मा और २००७ के लिए श्याम यादव को दी गई. पत्रकारिता के क्षेत्र में मोना बिल्लोरे गुमनाम नाम के समान है. वे किसी वक्त जब भोपाल से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र नवभारत में श्री विजयदत्त श्रीधर सम्पादक हुआ करते थे तब इस समाचार पत्र में कार्यरत थीं, इसके बाद उनका कार्यकाल सप्रे संग्रहालय और वर्तमान में वे सरकार के उपक्रम वन्या प्रकाशन में कार्यरत हैं. इन्हें किस योग्यता पर खरा पाया गया चयनकर्ता ही बता सकते हैं. वहीं श्री अंजनि झा और श्री सुरेश शर्मा एक विचारधारा से जुडे पत्रकारों के रूप में जाने जाते हैं. श्री झा जो कि बिहार से भोपाल आए, लेकिन राजधानी भोपाल में ही पत्रकारिता के क्षेत्र में ऐसा कुछ नहीं कर पाए कि उन्हें पत्रकार के रूप में ख्याती मिली हो, लेकिन वे संघ की विचारधारा वाले संवाद केन्द्र से जुडे होने का फायदा जरूर उठा गए. बिहार से भोपाल आकर अंतरराष्ट्रीय विषयों के विशेषज्ञ माने जाने वाले लब्धप्रतिष्ठित स्वर्गीय राजेन्द्र माथुर के नाम स्थापित फैलोशिप के वे कैसे हकदार बन गए यह तो चयनकर्ता ही जाने. इसी तरह संघ की विचारधारा वाले और 'अपनी सरकार÷ व 'सरकार के वे÷ कहने वाले श्री सुरेश शर्मा से तो सभी परिचित हैं. दैनिक स्वदेश से व्यापार प्रतिनिधि के रूप में पत्रकारिता का सफर शुरू कर उन्होंने खुद का एक साप्ताहिक अखबार 'शिखर मेल÷ निकाला. इस अखबार के वे मालिक, सम्पादक रहे. इनके बारे में बताते हैं कि अवसर पाते ही अखबार के नाम सरकार से जमीन आवंटित कराई और समय आते ही इसे किसी बिल्डर को अखबार सहित बेंच दी. श्री शर्मा का स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि वे हमारी सरकार के नाम पर ओजपूर्ण बातें कर वह सबकुछ पा जाना चाहते हैं जो कांग्रेस शासनकाल में वे नहीं पा सके थे. उन्होंने भी अवसर पाते इस फैलोशिप के लिए दरवाजा खटखटा दिया और फैलोशिप पा गए. इसी तरह उत्तरप्रदेश के गाजियाबाद के रहने वाले श्यामलाल यादव को वर्ष २००८ के लिए इस फैलोशिप से नवाजा गया. दुर्भाग्य की बात है कि किसी सरल, सौम्य और किसी गुट में शामिल न रहे स्वर्गीय श्री माथुर के नाम पर स्थापित फैलाशिप आज कैसे और किन पत्रकारों को मिल रही है, यह सब देख और सुन दुख होता है. उन लब्ध प्रतिष्ठित पत्रकारों को भी इसी बात का मलाल है जिन्हें पूर्व में इस फैलोशिप से नवाजा गया. आज वे जब मध्यप्रदेश सरकार द्वारा स्थापित इस फैलोशिप की दुर्गति होते या शासनतंत्र द्वारा निहितस्वार्थों के चलते करते देखते हैं तो कुछ समय के लिए सहम जाते हैं, और कुछ कह भी नहीं पाते हैं. आज जिस तरह यह फैलोशिप दी जा रही है उसके बारे में न तो कोई यह जान पाया है कि कब यह वितरित की गई, कब चयनकर्ताओं ने इनका चयन कर लिया और वे किस विषय पर शोध कार्य कर रहे हैं. इन शोधार्थियों द्वारा फैलोशिप के तय मापदंडों को पूरा भी किया जा रहा है या नहीं ।
राजेन्द्र पराशर वर्तमान में लोकमत समाचार में कार्यरत हैं।

इंदौर प्रेस क्लब पत्रकारिता कम राजनीती का अड्डा ज्यादा


भोपालइंदौर प्रेस क्लब की पानी गरिमा कभी हुआ करती थी, लेकिन बीती कुछ वर्षों में ये अर्श से फर्श पर आ गई है। यहाँ पत्रकारिता सीखने अब कोई नही आता। हाँ पहले जरुर वे पत्रकार जो करियर की शुरुआत करते थे, यहाँ आया करते थे की शायद कोई वरिष्ठ पत्रकार मिल जाए जो एकाध स्टोरी बता देन या फ़िर कोई स्टोरी आईडिया बता दे। लेकिन अब ऐसानही होता क्योंकि प्रेस क्लब के सदस्य इन दिनों चुनाव में व्यस्त हैं। पुरी पोलखोल रहे हैं इंदौर के अग्नि ब्लास्ट के सम्पादक मुकेश ठाकुर।
पड़ें-प्रेस क्लब में भटकती पत्रकारिता की आत्मा

Thursday, December 10, 2009

अब सबसे पहले आम आदमी मीडिया के दरवाजे खटखटाता है

पिछले कुछ वर्षो से मीडिया की जिस तरह से आलोचना हो रही है, उसे उसके सरोकार और दायित्वबोध की याद दिलाई जा रही है, वह बात हैरत में डालने वाली है। यह किसी भी क्षेत्र की बढ़ती ताकत का ही सबूत है यह इसे साबित करता है कि मीडिया से लोगों की अपेक्षाएं बहुत बढ़ गई हैं कि बाकी स्तंभों से ज्यादा याद उसकी होती है । लोकतंत्र के तीन संवैधानिक स्तंभों से उपजी निराशा भी शायद इसका कारण है कि लोग हर बीमारी को मीडिया ताकत से ठीक करना चाहते हैं । पहले चलन यह था कि सभी दरवाजों से निराश आदमी अखबार के दफ्तर में आता था । आज वह सबसे पहले अखबार या निजी चैनल के दफ्तर पहुँचकर न्याय मांगता है । स्टिंग आपरेशन और भ्रष्टाचार कथाओं तक पत्रकारों की पहुँच खोज से कम, जनता के सहयोग से ज्यादा सफल हो रही है ।लोकतंत्र के प्रति हमारी व्यापक प्रतिबद्धता के बावजूद उसके तीनों स्तंभों-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के प्रति आम जनता का नैराश्य बढ़ा है । सामाजिक बदलाव के दौर से गुजरता देश जहाँ तेजी से आर्थिक प्रगति कर रहा है, वहीं समाज में असमानता भी बढ़ी है । ऐसी विविध स्तरों वाली सामाजिक रचना हमारे लिए चिंतन और चुनौती दोनों का विषय है । शायद यही कारण है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में निरूपित किए जा रहे मीडिया के प्रति लोगों की उम्मीदें और शिकायतें बहुत बढ़ गई हैं । पिछले १० वर्षो का समय सूचना और मीडिया के व्यापक प्रसार का है तो उससे बढ़ती जा रही अपेक्षाओं का भी है । राजनीतिक तंत्र के प्रति अनास्था का विस्तार तो लंबे समय से जारी है, किन्तु धीरे-धीरे प्रशासन और न्यायपालिका के प्रति भी ऐसे ही भाव रेखांकित किए जाने लगे । संवैधानिक तंत्र के प्रति उपजे नैराश्य ने मीडिया को बहुत ही अपेक्षाओं का केन्द्र बना दिया। जरा कड़ी भाषा में कहें तो मीडिया एक ऐसा कंधा है जिसकी तलाश में हर आदमी है । मीडिया ही आपकी लड़ाई लड़े यह भाव प्रखर हो रहा है । दृश्य माध्यमों के हल्लाबोल ने इसे एक ऐसे शक्ति केन्द्र में तब्दील कर दिया है - जो आपकी हर समस्या का समाधान कर सकता है । उम्मीदों की यह बढ़ती हुई सीमारेखा, प्रभुवर्गो तक सीधी पहुँच, सवाल पूछने या खड़ा करने की ताकत ने मीडिया की महिमा बढ़ा दी है । आज मीडिया चौतरफा आलोचना का केन्द्र बन रहा है तो उसका सीधा कारण है कि वह जन अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रहा है । सूचना, शिक्षा, मनोरंजन से आगे उससे यह भी अपेक्षाएँ की जा रही हैं कि वह नैतिक पुलिस का काम करे । हर अन्याय से जूझे । आम आदमी प्रश्नों को उठाए। जबकि उसका अर्थतंत्र और बाजार की बढ़+ती शक्ति उसे पूर्णतः जनधर्मी रवैया अपनाने से रोकती है । बावजूद इसके मीडिया गहरे सामाजिक सरोकारों से जुड़कर काम कर रहा है । तमाम मुद्दों को सामने ला रहा है । भ्रष्टाचार, जनसुविधा के अभाव, संवेदनहीनता की कहानियाँ, स्टिंग ऑपरेशन, अपराध के पीछे चेहरों को मीडिया ही उजागर कर रहा है । कई मामलों में प्रशासन, पुलिस और सरकारी तंत्र से पहले पहुँचकर मीडिया अपने इस दायित्वबोधकी पुष्टि भी करता है । इस संदर्भ में खबरों को संज्ञान में लेकर दायर जनहित याचिकाएँ भी बिनी जा सकती हैं । मीडिया से बढ़ती जा रही उम्मीदें पूरा कर पाना संभव नहीं है । जाहिर है लोगों में मीडिया के प्रति असंतोष गहराता जाता है । नेता, पुलिस, बाबूराज से तंग लोग बड़ी उम्मीदों से चौथे स्तंभ की तरफ देखते हैं । वे यह आशा रखते हैं कि मीडिया उन्हें न्याय जरूर दिलाएगा । मीडिया ऐसे प्रसंगों पर संवेदनशीलता का रूख अपनाकर अपनी जनपक्षधरता का अपेक्षित प्रदर्शन भी करता है । जिससे मीडिया सत्ताधीशों, प्रशासन और प्रभुवर्गो के निशाने पर आ जाता है । यदि वह इनमें से किसी के दबाव में आ जाता है तो उसे आम आदमी या पीड़ित पक्ष की आलोचना का केन्द्र बनना पड़ता है । ऐसे में मीडिया के लिए तटस्थ रहकर अपना ईमानदार कार्य संपादन बेहद कठिन हो जाता है । हालात ऐसे हैं कि उसे हर हाल में आलोचना ही भुगतनी है । भ्रष्टाचार में आकंठ लिप्त राजनेता, अधिकारी भी मीडिया को नैतिक प्रवचन देने से बाज नहीं आते । मीडिया के दायित्वबोध पर जब ऐसे लोग वक्तव्य देते हैं तो बहुत दया आती है । प्रशासनिक-राजनैतिक तंत्र में पसरी संवेदनहीनता, संवादहीनता, भ्रष्टाचार, घूसखोरी कुछ ऐसे कारण हैं जिसके चलते मीडिया का उपयोग करने की प्रवृत्तियाँ बढ़ी हैं । इस उपयोगितावाद में मीडिया के लिए भी अच्छे-बुरे विचार मुश्किल हो जाता है । खबर जल्दी देने की त्वरा में कई बार तथ्यों की पूरी तरह पड़ताल नहीं हो पाती है । इस भ्रष्ट तंत्र में शामिल लोग भी एक-दूसरे के खिलाफ खबरें छपवाने के लिए मीडिया के इस्तेमाल की कोशिशें करते हैं । खबर पाने का लोभ शायद ही कोई मीडियाकर्ती छोड़ पाता हो । यह आपाधानी नये तरह के दृश्य रच रही है । सामाजिक अपेक्षाओं की पूर्ति हर स्तर पर करने के बावजूद कहीं न कहीं कमी रह ही जाती है । लोकतंत्र के तीन स्तंभ यदि अपनी भूमिका को पुनर्परिभाषित नहीं करते और अपने दायित्वबोध के प्रति सजग नहीं होते तो मीडिया की ताकत अभी और बढ़ेगी । यदि हमारा तंत्र संवेदनशीलता के साथ काम करे, अंतिम व्यक्ति को न्याय देने का सामर्थ्य विकसित करे तो हालात बेहतर होते नज+र आएंगे । अराजक स्थितियाँ खबरों के लिए स्पेस बनाती हैं । यह गंभीरता से सोचें तो हमारी राजनीतिक-प्रशासनिक और व्यवस्था की कुछ कमियों ने मीडिया की प्रभुता का आकाश बहुत बड़ा कर दिया । अब प्रभुवर्गो की सारी शक्ति इसी मीडिया को मैनेज करने लगी है । क्योंकि कोई भी खुद को आइने के सामने खड़ा करने को तैयार नहीं है । ऐसे में हमें अपने सामाजिक सरोकारों, दायित्वों को समझकर देश के प्रशासनिक-राजनीतिक तंत्र में भी वही संवेदना जगानी होगी, जिस संवेदना से मीडिया अपने दायित्वबोध को अंजाम देता आया है। शायद आलोचनाओं की जद में आज मीडिया इसलिए भी है क्योंकि लोगों की उम्मीदें सिर्फ उसी पर टिकी है । लोगों को भरोसा है कि मीडिया ही समाज में घट रहे अशोभन को घटने से रोक सकता है । मीडिया की आलोचना का तेज होता स्वर दरअसल उसकी बढ़ती स्वीकार्यता, शक्ति का ही प्रगटीकरण है।
संजय द्विवेदी
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)

Saturday, December 05, 2009

युद्ध पत्रकारिता पर एक बेहतरीन पुस्तक

रक्षा विषयों और खासतौर पर रक्षा पत्रकारिता पर हिन्दी में, पुस्तकों का व्यापक अभाव है। आज हिन्दी के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं का ही व्यापक विस्तार नहीं हुआ है। बल्कि प्रसार और पाठकों की दृष्टि से हिन्दी को व्यापक स्वीकार्यता व समर्थन मिला है। इस सबके बावजूद त्रासदी यह है कि विज्ञान और तकनीकी की पुस्तकों की तरह रक्षा विषयों पर हिन्दी में पुस्तकों के साथ ही दूसरी पठन-पाठन सामग्री अत्याधिक अल्प मात्रा में उपलब्ध है। ऐसे में छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी रायपुर द्वारा, प्रकाशित शिव अनुराग पटैरया की पुस्तक प्रतिरक्षा पत्रकारिता एक अच्छी पहल है। प्रतिरक्षा पत्रकारिता के क्षेत्र में अब तक शायद ही कोई पुस्तक हिन्दी में उपलब्ध हो। श्री पटैरया की पुस्तक इस कमी को पूरा ही नहीं करती है बल्कि प्रतिरक्षा पत्रकारिता के विद्यार्थियों के साथ ही दूसरे आम लोगों में रक्षा विषयों की समझ व सरोकार पैदा कर सकती है। प्रतिरक्षा पत्रकारिता की भूमिका में प्रसिद्ध पत्रकार और छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी के संचालक श्री रमेश नैयर ने लिखा है- प्रतिरक्षा रिपोर्टिंग हिन्दी पत्रकारिता की एक नई शाखा है, जो इधर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाती है। हिन्दी प्रतिरक्षा रिपोर्टिंग का इतिहास भले ही महाभारत काल से तलाश लिया जाए और महाभारत के महासमर का ऑखो देखा हाल बयान करने वाले संजय को प्रथम समर-संवाददाता बता दिया जाए, परंतु आधुनिक हिंदी पत्रकारिता में प्रतिरक्षा रिपोर्टिंग का क्षेत्र खाली-खाली सा दिखाई देता रहा है। सन् १९४७ के अंत में पाकिस्तान द्वारा कश्मीर पर किए गए आक्रमण की रिपोर्टिंग कुछ अंग्रेजी अखबारों और ऑल इंडिया रेडियो द्वारा सरकारी एजेंसियों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर की गई। पाकिस्तान द्वारा १९६५ में किए गए आक्रमण और दोनों देशों के बीच हुए युद्ध की रिपोर्टिग अंग्रेजी के साथ ही हिन्दी एवं अन्य भाषाई समाचार-पत्रों और समाचार एजेंसियों द्वारा कुछ विस्तार से की गई। फिर १९७१ में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम और उसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान द्वारा पूरब और पश्चिम में एक साथ भारत के विरूद्ध मोर्चे खोल दिए जाने पर पहली बार भारतीय मीडिया ने समरक्षेत्र के बहुत निकट पहुंचकर घटनाक्रम की रिपोर्टिंग की। उस दौरान पत्रकारों ने कुछ जोखिम उठाकर युद्ध-क्षेत्र के जीवंत वृतांत प्रस्तुत किए। "धर्मयुग" के संपादक श्री धर्मवीर और साहित्य, पत्रकारिता एवं राजनीति में समान रूप से सक्रिय श्री विष्णुकांत शास्त्री ने बंगलादेश मुक्ति संग्राम का आंखो देखा जो विस्तृत विवरण सिलसलेवार प्रकाशित किया, वह हिंदी में परिपक्व "प्रतिरक्षा रिपोर्टिंग का उत्कृष्ठ उदाहरण था! परंतु तब भी भारतीय पत्रकारिता में प्रतिरक्षा रिपोटिंग की स्वतंत्र शाखा विकसित नहीं हो पाई थी। स्थितियां अब तेजी से बदल रही है। कारगिल युद्ध के बाद से भारतीय मीडिया में "प्रतिरक्षा रिपोर्टिंग" का महत्व समझा जाने लगा है। पत्रकार एवं संस्कृतिकर्मी श्रीमती शालीना चतुर्वेदी द्वारा संकलित जानकारी के अनुसार कारगिल युद्ध में मेजर पुरूषोत्तम चौबें ने दोहरी भूमिका निभाई थी। हथियारों से लैस वह युद्ध क्षेत्र में डटे ही थे, परंतु उसके साथ ही समर-रिपोर्टिंग का दायित्व भी वह समय-समय पर संभालते रहे। पत्रकार मित्रों की जान बचाते हुए ही मेजर चौबे ने शहादत दी थी। इसी प्रकार कर्नल जौली ने भी पत्रकारिता का विधिवत् प्रशिक्षण लिया मेरा ऐसे कुछ सेनाधिकारियों से परिचय रहा है, जो सेना से सेवानिवृत्ति लेकर पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हुए और प्रतिरक्षा विशेषज्ञ के रूप में नाम भी कमाया।२९ अध्यायों में बटी श्री पटैरया की पुस्तक में भारतीय महाद्वीप के संदर्भ में भारत की सुरक्षा चिंताओं को रेखांकित करते हुए, देश की सामरिक शक्ति तीनों सेनाओं थल, जल और नभ की न केवल सार्मथ्य की व्यवस्था की गई है, बल्कि अतीत में हुए रूद्धों का सिलसिलेवार विवरण भी दिया गया है। निश्चिततौर पर यह पुस्तक केवल प्रतिरक्षा पत्रकारिता के छात्रों के लिए उपयोगी होगी, बल्कि उन लोगों को भी पसंद आएगी, जो भारतीय उपमहाद्वीप के रक्षा संदर्भो को, अपनी भाषा में पढ़ना चाहते है।
sabhar-dakhal.net

Friday, December 04, 2009

गैस ट्रेजिडी पर भास्कर की अदभुत श्रधान्जली

भोपाल। दुनिया में कई काम अदभुत होते हैं कुछ नेक नियत के साथ तो कुछ ग़लत नियत के साथ। लेकिन दैनिक भास्कर ने गैस ट्रेजिडी पर जिस तरह से श्रधांजलि दी वह अदभुत है, न केवल मानवीयता के लिहाज से बल्कि पत्रकारिता में भी एक मिसाल है। शायद इसी लिए भास्कर सबसे अलग है। इसके पहले केवल नई दुनिया ने आपातकाल के समय पेज खाली देकर लोगों को सही मायने में आपातकाल का अहसास दिलाया था। इस भास्कर ने २ दिसंबर की कलि रात को हुए हादसे के लिए ३ दिसंबर के अख़बार के सभी पेज ब्लेक एंड व्हाइट रखे। ३ दिसंबर की सुबह जब लोगों ने अख़बार पड़ा तो उनको २५ साल पहले हुई घटना का अहसास हुआ। आम और खास ने उस रात को महसूस किया। इसके लिए भास्कर की टीम बधाई और साधुवाद की पात्र है। भास्कर ने ३ दिसंबर को जो कंटेंट लिया वहभी लाजवाब है। एक बानगी उस हादसे की भास्कर के द्वारा।

गैस ट्रेजिडी पर भास्कर बना नेट की दुनिया में चर्चा का विषय

गैस कांड में छा गए दैनिक भास्कर और इंडिया टीवी
भोपाल गैस त्रासदी को २५ बरस बीत गए हैं ! इन २५ सालों में मध्यप्रदेश में बहुत कुछ बदला हैं , नहीं बदला हैं तो सिर्फ गैस पीड़ितों का दुःख-दर्द इस दर्द और दुःख को इस बार खबरिया चैलनों और अख़बारों ने भरपूर जगह दी टेलीविजन चैनल्स पर इंडिया टीवी और स्टार न्यूज़ ने इसमें बाजी मरी तो अख़बारों में दैनिक भास्कर इसके कवरेज में टॉप पर बना रहा भोपाल के गैस पीड़ितों से जुड़े दुःख-दर्द को बड़े अख़बार और टेलीविजन भुला चुके थे लेकिन गैस त्रासदी के २५ साल पूरा होने पर टेलीविजन और अख़बार एक बार फिर सकारात्मक सक्रिय भूमिका में नज़र आए २५ सालों को याद कर दैनिक भास्कर, भोपाल में ब्लैक एंड व्हाइट छपा वहीँ वरिष्ट पत्रकार राजकुमार केशवानी के संपादन में गैस कांड पर एक दस्तावेज प्रकाशित किया गया हैं जिस कारण भास्कर एक बार फिर सिरमोर साबित हुआ हैं भास्कर के ऐसे प्रयोग उसे दूसरे अख़बारों से अलग बना देते हैं भोपाल गैस कांड की २५ वीं बरसी पर इस बार न्यूज़ चैनल भी पूरी तैयारी के साथ नज़र आए स्टार न्यूज़ और इंडिया टीवी ने इसमें बाजी मारी वहीँ सबसे आगे और सर्वक्षेष्ठ का दम भरने वाला आज तक इस मामलें में फिसड्डी साबित हुआ गैस पीड़ितों की आवाज बुलंद करने के लिए बने कार्यक्रम में इंडिया टीवी का "नरसंहार" इस तरह के कार्यक्रमों में सर्वक्षेष्ठ रहा दूसरे नंबर पर स्टार न्यूज़ का "टैंक नं। ६१०" रहा तीसरे नंबर पर एन डी टीवी के बेहतरीन कवरेज को माना जा सकता हैं स्टार न्यूज़ ने हांलाकि इस कार्यक्रम को बनाने के लिए अपने एक दर्जन लोगो को लगाया और भरपूर पैसा खर्च किया लेकिन इस सब के बावजूद वह उतना कैचिंग नहीं बना जितना इंडिया टीवी का "नरसंहार" भोपाल गैस त्रासदी पर बने कार्यक्रमों से एक बात फिर साफ़ हो गई कि विज्युअल , स्क्रिप्ट और कुल मिलाकर पैकेजिंग अच्छी हो तो दर्शक हर खबर देखता हैं स्टार न्यूज़ के ब्रजेश राजपूत और उनके एक दर्जन साथी "टैंक नं. ६१० को" लाव लश्कर के साथ तैयार कर रहे थे तो बाकी चैनल के रिपोर्टर अकेले अपनी कैमरा टीम के साथ लगे थे इंडिया टीवी के अनुराग उपाध्याय के "नरसंहार" और एन डी टीवी की रुबीना खान शापू के कवरेज को इस मामले पर एक मिसाल माना जा सकता हैं यह पहला मौका हैं जब चैनल और अख़बार एक साथ किसी एक जन त्रासदी से जुड़े मामले पर एक राय नज़र ही नहीं आए उन्होंने आम लोगो कि आवाज भी जमकर बुलंद की

साभार-दखल नेट

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