Wednesday, April 01, 2009

कहाँ जायेगी ये लडाई

पत्रकार जगत में कुछ स्तम्भ ऐसे हैं जिनको हमेशा आदर्श से देखा जाता है। लेकिन जब बड़े और नामी पत्रकार खुलकर मैदान में आने लगे तो शायद नवागंतुक पत्रकारों के सामने भ्रम और चिंता की स्थिति निर्मित हो जाती है। कुछ एसा ही हो रहा है।
मृणाल पांडेय और वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की कलम बजाय सिस्टम के खिलाफ आग उगलने के एक-दूसरे के खिलाफ चल रही है। केसे आप ख़ुद देखिये, भड़ास4मीडिया के सहयोग से।


बदलती अखबारी दुनिया और पत्रकारिता की चुनौतियां
-मृणाल पांडेय
विश्वव्यापी मंदी ने जिन कई संस्थानों की चूलें बुरी तरह से हिला डाली हैं, अखबार जगत उनमें से एक है। और व्यापक मंदी की मार विकासशील देशों के छोटे-छोटे अखबारों पर ही नहीं, दि न्यूयॉर्क टाइम्स, बोस्टन ग्लोब तथा लॉस एंजेलीस टाइम्स जैसे अमेरिकी अखबारों पर भी पड़ी है। दो बड़े अखबारों-शिकागो ट्रिब्यून तथा लॉस एंजेलीस टाइम्स छापने वाले संस्थान (दि ट्रिब्यून कं.) ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया है। खर्चा घटाने को न्यूजर्सी के सबसे बड़े अखबार ने अपने आधे स्टाफ की छंटनी कर डाली है, और बाल्टीमोर सन तथा बोस्टन ग्लोब ने विदेशों से अपने संवाद-ब्यूरो हटा लिए हैं। बाजार में न्यूयार्क टाइम्स की कीमत पहले की दशमांश रह गई है, और तमाम कटौतियों के बाद भी वह मेक्सिको के एक बड़े उद्योगपति से लोन मांगने को मजबूर हुआ है, ताकि रोजाना का कामकाज चलता रहे।
कहने को कहा जा सकता है कि इंटरनेट, सर्च इंजिनों तथा ब्लॉग साइट्स के युग में मीडिया का कलेवर अब बदलेगा ही। और आज नहीं तो कल हिंदी पट्टी में भी लोगबाग नेट तथा केबल पर ही अखबार पढ़ेंगे। लेकिन क्या आप जानते हें कि आज भी इंटरनेट पर 85 प्रतिशत खबरों का स्रोत प्रिंट मीडिया ही है। वजह यह, कि सर्च इंजिन गूगल हो अथवा याहू, दुनियाभर में अपने मंजे हुए संवाददाताओं की बड़ी फौज तैनात करने की दिशा में अभी किसी इंटरनेट स्रोत ने खर्चा नहीं किया है। और वह करे भी, तो रातोंरात अखबार के कुशल पत्रकारों जैसी टीम वह खड़ी नहीं कर सकेंगे। बड़े अखबारों और वरिष्ठ संवाददाताओं से पाठक, नागरिक संगठन या सरकारें भले ही कई मुद्दों पर मतभेद रखें, इसमें शक नहीं कि युद्ध से लेकर बैंकिंग तक के घोटालों, रोमानिया तथा भारत से लेकर श्रीलंका तक में अलोकतांत्रिक घटनाओं तथा लोकतांत्रिक चुनावों और पर्यावरण तथा खाद्यसुरक्षा स्थिति की बाबत जन-जन तक बारीक जानकारियां पहुंचा कर मानवहित में विश्वव्यापी जनसमर्थन जुटाने का जो काम बड़े अखबारों के संवाददाताओं ने दुनियाभर में किया है, उसके बिना आज दुनिया में लोकतंत्र और मानवाधिकार काफी हद तक मिट चुके होते।
कई लोगों का मानना है कि अखबारों के खासकर भारत के अंग्रेजी अखबारों के क्षय की बड़ी वजह पाठकों की गिरती तादाद है। लेकिन यह पूरी तरह सच नहीं। आज भी अच्छे अखबारों के पाठकों की संख्या कोई कम नहीं, खासकर भारतीय भाषाओं में। लेकिन दिक्कत यह है, कि पाठकों को सबसे सस्ता अखबार देने की होड़ में अखबार दामी विज्ञापनों के बूते अपनी असली लागत से कहीं कम (लगभग 1/10वीं) कीमत पर बेचे जाते रहे हैं। और इधर बाजार की मंदी के कारण वह विज्ञापनी प्राणवायु लगातार घटती जा रही है। अब अगर अखबार अपनी असली लागत पर बेचे जाने लगे, तो उसके पाठक निश्चिय ही घटने लगेंगे। खबरिया चैनल तथा ब्लॉग एक हद तक खबरों या गॉसिप की भूख मिटा सकते हैं, लेकिन चैनलों की तुलना में अखबारों की कवरेज बहुआयामी होती है। उसमें सिर्फ स्टोरी ही नहीं, उसका वरिष्ठ संवाददाताओं तथा संपादकों द्वारा बाकायदा विश्लेषण और उसकी अदृश्य पृष्ठभूमि से जुड़े तमाम तरह के ब्योरे और जानकारियां भी मौजूद होते हैं। इंटरनेट की भाषायी पाठकों तक अभी वैसी पहुंच भी नहीं बनी है, जैसी कि अंग्रेजी पाठकों की। लेकिन इन दिनों बदलाव की जो हवा नई तकनीकी के साथ बह रही है, उसने मोबाइल तथा केबल टी.वी. के जरिए हिन्दी पट्टी में सूचना क्षेत्र में अपनी भारी उपस्थिति तो दर्ज करा ही दी है।
यह एक विडंबना ही है, कि जिस वक्त दुनिया के अनेक महत्वपूर्ण अखबारों के जनक और वरिष्ठ पत्रकार, इंटरनेट और अभूतपूर्व आर्थिक मंदी की दोहरी चुनौतियों से जूझते हुए नई राहें खोज रहे हैं, वहीं हमारे देश में (संभवत: पहली बार) लहलहा चले ज्यादातर भाषाई अखबारों को यह गलतफहमी हो गई है, कि लोकतंत्र का यह गोवर्धन जो है, उन्हीं की कानी उंगली पर टिका हुआ है। इसलिए वे कानून से भी ऊपर हैं। ऊपरी तौर से इस भ्रांति की कुछ वजहें हैं। क्योंकि हर जगह से हताश और निराश अनेक नागरिक आज स्वत: स्फूर्त ढंग से मीडिया की शरण में उमड़े चले जा रहे हैं। और यह भी सही है, कि हमारे यहां अनेक बड़े घोटालों तथा अपराधों का उदघाटन भी मीडिया ने ही किया है। लेकिन ईमान से देखें तो अपनी व्यापक प्रसार संख्या के बावजूद भाषायी पत्रकारिता का अपना योगदान इन दोनों ही क्षेत्रों में बेहद नगण्य है। दूसरी तरफ ऐसे तमाम उदाहरण आपको वहां मिल जाएंगे, जहां हिन्दी पत्रकारों ने छोटे-बड़े शहरों में मीडिया में खबर देने या छिपाने की अपनी शक्ति के बूते एक माफियानुमा दबदबा बना लिया है। और पैसा या प्रभाववलय पाने को वे अपनी खबरों में पानी मिला रहे हैं। सरकारी नियुक्तियां, तबादलों और प्रोन्नतियों में बिचौलिया बनकर गरीबों से पैसे भी वे कई जगह वसूल रहे हैं, और भ्रष्ट सत्तारूढ़ मुफ्त में नेताओं को ओबलाइज करके उनसे सस्ते या जमीनी और खदानी पट्टे हासिल कर रहे हैं, इसके भी कई चर्चे हैं। चूंकि एक मछली भी पूरे तालाब को गंदा कर सकती है, हिन्दी में कई अच्छे पत्र और पत्रकारों की उपस्थिति के बावजूद हमारे यहां आम जनता के बीच भाषायी पत्रकारों का नाम बार-बार अप्रिय विवादों में उछलने से अब उनकी औसत छवि बहुत उज्ज्वल या आदरयोग्य नहीं है।
इधर इंटरनेट पर कुछेक विवादास्पद पत्रकारों ने ब्लाग जगत की राह जा पकड़ी है, जहां वे जिहादियों की मुद्रा में रोज कीचड़ उछालने वाली ढेरों गैर-जिम्मेदार और अपुष्ट खबरें छाप कर भाषायी पत्रकारिता की नकारात्मक छवि को और भी आगे बढ़ा रहे हैं। ऊंचे पद पर बैठे वे वरिष्ठ पत्रकार या नागरिक उनके प्रिय शिकार हैं, जिन पर हमला बोल कर वे अपने क्षुद्र अहं को तो तुष्ट करते ही हैं, दूसरी ओर पाठकों के आगे सीना ठोंक कर कहते हैं कि उन्होंने खोजी पत्रकार होने के नाते निडरता से बड़े-बड़ों पर हल्ला बोल दिया है। यहां जिन पर लगातार अनर्गल आक्षेप लगाए जा रहे हों, वे दुविधा से भर जोते हैं, कि वे इस इकतरफा स्थिति का क्या करें? क्या घटिया स्तर के आधारहीन तथ्यों पर लंबे प्रतिवाद जारी करना जरूरी या शोभनीय होगा? पर प्रतिकार न किया, तो शालीन मौन के और भी ऊलजलूल अर्थ निकाले तथा प्रचारित किए जाएंगे।
अभी हाल में एक ब्लॉग ने एक महत्वपूर्ण अंग्रेजी खबरिया चैनल की वरिष्ठ महिलाकर्मी के बारे में बेहद आपत्तिजनक भाषा ओर अपुष्ट तथ्यों के बूते एक मुहिम छेड़ दी थी। चैनल ने कानून की मदद से उसको अपनी उसी साइट पर अपनी गलती स्वीकार करने और माफी मांगने पर बाध्य किया। एक अच्छे स्थापित पेशेवर व्यकित के लिए अपनी साख पर झूठा बट्टा लगाया जाना, शारीरिक उत्पीड़न से कहीं अधिक यंत्रणादायक हो सकता है। कोई दुर्भावनावश उसकी लगातार यश-हत्या करता रहे, और पकड़े जाने पर अपनी क्षुद्रता या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला देकर आत्मरक्षात्मक तेवर अख्तियार करे, तो क्या उसे हंस कर बरी कर दिया जाए, ताकि वह और भी साखदार लोगों की पगड़ी उछालता फिरे? ऐसे क्षणों में हमारा पत्रकार जगत प्राय: अपने लिए किसी आचरण संहिता और अवमानना के दोषी सहकर्मियों पर सख्त कानूनी व्यवस्था का विरोध करता है। पर अगर प्रोफेशनल दुराचरण साबित होने पर एक डॉक्टर या चार्टर्ड अकाउंटेंट नप सकता है, तो एक गैरजिम्मेदार पत्रकार क्यों नहीं? हमारी राय में मीडिया की छवि बिगाड़ने वाली इस तरह की गैर-जिम्मेदार घटिया पत्रकारिता के खिलाफ ईमानदार और पेशे का आदर करने वाले पत्रकारों का भी आंदोलित होना आवश्यक बन गया है, क्योंकि इसके मूल में किसी पेशे की प्रताड़ना नहीं, पत्रकारिता को एक नाजुक वक्त में सही, धंधई पटरी पर लाने की स्वस्थ इच्छा है।

जवाब हम देंगे
संजय कुमार सिंह
स्ट्रिंगरों का माफियानुमा दबदबा और मृणाल जी की हिटलरी !!
दैनिक हिंदुस्तान की प्रमुख संपादक मृणाल पांडेय का संपादकीय लेख पढ़कर ही लगा था कि इसका जवाब लिखना बेहद जरूरी है। मैंने लिखकर रोजी रोटी चलाने की कोशिश की थी पर मामला जमा नहीं और मुफ्त में लिखने का शौक या छपास रोग रहा नहीं। इसलिए लिखना हो नहीं पाया। पर भड़ास4मीडिया के यशवंत सिंह ने मानो चुनौती दी है कि मृणाल पांडेय को जवाब देना बहुत मुश्किल है।
(जानता हूं कोई तीर नहीं मारने जा रहा पर मृणाल जी ने मधुमक्खी के छत्ते पर पत्थर मारा है तो जितना संभव और मौका है, काट-बकोट लूं। उन्होंने तो जो करना था सो कर ही लिया है)। मृणाल जी को मैंने पहले कभी नहीं पढ़ा है क्योंकि फिक्शन में मेरी दिलचस्पी नहीं रही। मृणाल पांडेय ने एनडीटीवी से नौकरी छोड़ने के बाद वहां के हालात पर एक फिक्शन लिखा था। फिक्शन इसलिए क्योंकि सच को साफ-साफ कहने-लिखने का साहस उनमें न था। इसलिए सारी बातें अमूर्तता और इशारों-इशारों से कहने की कोशिश की। एक और चीज है, लिखे से कमाई भी हो जाती है इसलिए लिखना छोड़ा भी नहीं जा सकता। और लिखने के लिए कुछ न कुछ लिखना है तो उन्होंने यह लेख भी दे मारा। सच को फिक्शन की शक्ल में लिखकर खुद मानहानि से बचने का रास्ता अपना चुकी मृणालजी को सच कहने वाले पसंद नहीं हैं, तभी तो उन्होंने अपने लेख में विश्वव्यापी मंदी से शुरू करके बदलती अखबारी दुनिया और पत्रकारिता की चुनौतियां विषय पर लेख लिखकर उन्होंने वही किया है जो उनके शब्दों में, ..कुछेक विवादास्पद पत्रकारों ने ब्लॉग जगत की राह पकड़कर ... और अपुष्ट खबरें छापकर .... किया है।
मृणाल पांडे को विश्वव्यापी मंदी और इस कारण दुनिया भर के अखबारों की हुई दुर्दशा की चिन्ता के साथ-साथ इस बात की भी चिन्ता है कि हिन्दी पत्रकार रूपी एक मछली भी पूरे तालाब को गंदा कर सकती है और उन्होंने बताया है कि हमारे यहां आम जनता के बीच भाषायी पत्रकारों की छवि बहुत उज्ज्वल या आदर योग्य नहीं है। पर वे यह नहीं बतातीं कि इसे ठीक करने के लिए वे क्या कर रही हैं या क्या किया है। बहुत ही चलताऊ अंदाज में उन्होंने हिन्दी पत्रकारों को कोसा है पर इससे भाषायी पत्रकारिता की नकारात्मक छवि कैसे ठीक होगी, यह नहीं समझ आ रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स को रोजाना के कामकाज चलाने के लिए कर्ज लेना पड़ा, यह तो उन्होंने बताया है पर यह नहीं बताया कि हिन्दुस्तान से बेरोजगार हुए लोग को कर्ज भी मिल पा रहा है कि नहीं।
विवादास्पद पत्रकारों (में से एक) ने अगर अपने ब्लॉग पर (जिसका नाम ही गॉशिप अड्डा है) यह लिख दिया कि हिन्दुस्तान समूह के मालिक के निधन के बावजूद लखनऊ में पार्टी मनी या हिन्दुस्तान टाइम्स ने उनकी जगह किसी और की फोटो छाप दी तो इसमें गलत क्या है। इससे भाषायी पत्रकारिता की नकारात्मक छवि भी कहां आगे बढ़ पाई। यह महानता तो अंग्रेजी के अखबार की थी। इसी तरह शैलबाला मामले की सूचना देकर भड़ास4मीडिया ने क्या गलत किया। उसने तो उस सपने की खबर भी दी जो हिन्दुस्तान वालों को पहले ही आ गई थी कि शैलबाला नौकरी से निकाले जाने के बाद धकियाई जाएंगी और धकियाने वालों के खिलाफ थाने जाएंगी
इसी तरह, रचना वर्मा ने अगर आपकी दी सलाह - परेशानी है तो नौकरी छोड़ दो, को सार्वजनिक करके भाषायी पत्रकारिता की नकारात्मक छवि को आगे बढ़ाया है तो इसका श्रेय आपको ही है। आपने अंग्रेजी की एक महिला टीवी पत्रकार के खिलाफ ब्लॉग पर आपत्तिजनक भाषा में अभियान चलाने के मामले का जिक्र किया है। संबंधित पत्रकार और उसके संस्थान ने उससे माफी मंगवा ली, उसने पोस्ट हटा ली। उसकी थू-थू हो गई। बाकियों को सीख भी मिल गई होगी। अब क्या आप उसकी जान लेंगी। इस मामले का हवाला देकर आप क्या कहना चाहती हैं। इसे कोई भी सही नहीं कहेगा और किसी को ऐसी आजादी नहीं चाहिए। लेकिन किसी एक ब्लॉगर ने ऐसा किया इसलिए ब्लॉगिंग ही बंद कराने की आपकी इच्छा खतरनाक है।
अगर उमेश जोशी ने लिखा है कि प्रभाष जोशी की भाषा से उनके दंभ, क्रूरता और रागद्वेष का पता चलता है तो क्या यह कोई नई बात है। और अगर प्रभाष जोशी ने इसका प्रतिकार नहीं किया तो क्या उनके शालीन मौन के ऊल जलूल अर्थ निकाले जा सकते हैं। मृणाल पांडेय ऐसा मानती हों तो मानें पर उनसे सहमत होने का कोई कारण नहीं है। दूसरी ओर, संपादक पत्रकार जब सार्वजनिक जीवन जीने वालों की निजी जिन्दगी में झांकते और झांकने का अधिकार व आजादी चाहते हैं तो क्या संपादकों को इसके लिए खुद तैयार नहीं होना चाहिए।
आप अपने लिखे से अपनी जो छवि बनाती हैं उसके आधार पर कितने युवा लोग पत्रकार बनने का फैसला करते हैं, आपके मातहत आपके साथ काम करने के लिए लालायित रहते हैं और कई बार जब उन्हें आपके मातहत आकर पता चलता है कि असल में आप वो नहीं हैं जो लबादा आपने पहन रखा है तो उनके मन पर क्या बीतती है, उनके दिल-दिमाग में क्या होता है, इसकी कल्पना कभी की है आपने। प्रभाष जोशी को महान पत्रकार मानकर कितने ही लोग पत्रकार बन गए। अपने कैरियर के संबंध में महत्त्वपूर्ण निर्णय कर लिया पर समय निकल जाने के बाद उनकी यह राय मालूम हुई कि ज्यादा पैसे देने से कोई अच्छा शीर्षक नहीं लगा सकता या अच्छी कविता नहीं लिख सकता। यह उनकी राय है। सार्वजनिक है। इस राय के लिए उन्हें अच्छा संपादक कहा जा सकता है पर यह भी सच है कि पैसे ठीक न मिलें तो अच्छा शीर्षक लगाने वाला शीर्षक लगाता ही रहेगा, यह जरूरी नहीं है।
इसलिए आप यानी ऊंचे पद पर बैठे वरिष्ठ पत्रकार या नागरिक कैसे हैं, यह जानना उनका हक है जो ऐसे लोगों के प्रशंसक हैं और अगर कोई यह काम कर रहा है तो उसके खिलाफ मानहानि कानून और सत्ता, शक्ति का उपयोग करके आप कोई महानता नहीं कर रही हैं। भाषायी पत्रकारिता की नकारात्मक छवि को आगे बढ़ने से रोकने के लिए मानहानि कानून का सहारा लेने की बजाय निन्दक नियरे राखिए आंगन कुटि छवाय में विश्वास कीजिए - सबका भला होगा। अगर आपमें पत्रकारिता को धंधई पटरी पर लाने की स्वस्थ इच्छा वाकई है तो उन घोटालों और गड़बड़ियों पर भी नजर डालिए जो मालिकान कर रहे हैं और कुछेक संपादक भी। मुफ्त में काम करने वाले स्ट्रिंगरों को कैसे रखा और हटाया जाता है, सब जानते हैं। ऐसे में वे क्या माफियानुमा दबदबा बनाएंगे और क्या पानी मिलाएंगे। वैसे भी, बेचारे तो जरा सा ही दूध बेच पाते हैं उसमें कितना पानी मिला लेंगे। उनकी चिन्ता छोड़िए।

अब इन दोनों लेख के बाद कौन तय करेगा की कौन सही है और कौन ग़लत है?

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