Tuesday, April 27, 2010

संजीवनी

"सृजन, चिन्तन, मंथन का प्रतिरूप हो तुम,
मन की स्वरलहरिया का स्वरूप हो तुम,
विचारों के आवेग में बसने वाले,
मेरी अभिव्यक्ति, मेरी अनुभूति का अभिप्राय हो तुम,
तीव्र तृष्णा के बीच में अतृप्त सा मन,
मन की मृग-तृष्णा को दूर करने का आधार हो तुम,
नहीं लांघना मर्यादाओं की लक्षमणरेखा,
मेरे लिए जीवन का अटल सत्य हो तुम,
मन के प्रवाह पर एकाधिपत्य है तुम्हारा,
मन जीवन की स्वर्ण जड़ित पतवार हो तुम,
जीवन बेला में कुछ भी असंभव नहीं लगता,
मेरे लिए प्राणवायु और संजीवनी से बढकर हो तुम।।
डॉ.सुरेन्द्र मीणा
डी/16, बिरलाग्राम नागदा जंक्शन, जिला उज्जैन(मध्य प्रदेश)
मोबाइल-09827305628
(डॉ सुरेन्द्र मीणा पेशे से एक कालेज में प्रोफ़ेसर हैं। साहित्य में विशेष रूचि रखते हैं और नागदा में होने वाले सामाजिक कार्यक्रमों में भी बढ चढ़कर हिस्सा लेते हैं।)

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