Saturday, December 05, 2009

युद्ध पत्रकारिता पर एक बेहतरीन पुस्तक

रक्षा विषयों और खासतौर पर रक्षा पत्रकारिता पर हिन्दी में, पुस्तकों का व्यापक अभाव है। आज हिन्दी के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं का ही व्यापक विस्तार नहीं हुआ है। बल्कि प्रसार और पाठकों की दृष्टि से हिन्दी को व्यापक स्वीकार्यता व समर्थन मिला है। इस सबके बावजूद त्रासदी यह है कि विज्ञान और तकनीकी की पुस्तकों की तरह रक्षा विषयों पर हिन्दी में पुस्तकों के साथ ही दूसरी पठन-पाठन सामग्री अत्याधिक अल्प मात्रा में उपलब्ध है। ऐसे में छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी रायपुर द्वारा, प्रकाशित शिव अनुराग पटैरया की पुस्तक प्रतिरक्षा पत्रकारिता एक अच्छी पहल है। प्रतिरक्षा पत्रकारिता के क्षेत्र में अब तक शायद ही कोई पुस्तक हिन्दी में उपलब्ध हो। श्री पटैरया की पुस्तक इस कमी को पूरा ही नहीं करती है बल्कि प्रतिरक्षा पत्रकारिता के विद्यार्थियों के साथ ही दूसरे आम लोगों में रक्षा विषयों की समझ व सरोकार पैदा कर सकती है। प्रतिरक्षा पत्रकारिता की भूमिका में प्रसिद्ध पत्रकार और छत्तीसगढ़ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी के संचालक श्री रमेश नैयर ने लिखा है- प्रतिरक्षा रिपोर्टिंग हिन्दी पत्रकारिता की एक नई शाखा है, जो इधर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाती है। हिन्दी प्रतिरक्षा रिपोर्टिंग का इतिहास भले ही महाभारत काल से तलाश लिया जाए और महाभारत के महासमर का ऑखो देखा हाल बयान करने वाले संजय को प्रथम समर-संवाददाता बता दिया जाए, परंतु आधुनिक हिंदी पत्रकारिता में प्रतिरक्षा रिपोर्टिंग का क्षेत्र खाली-खाली सा दिखाई देता रहा है। सन् १९४७ के अंत में पाकिस्तान द्वारा कश्मीर पर किए गए आक्रमण की रिपोर्टिंग कुछ अंग्रेजी अखबारों और ऑल इंडिया रेडियो द्वारा सरकारी एजेंसियों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर की गई। पाकिस्तान द्वारा १९६५ में किए गए आक्रमण और दोनों देशों के बीच हुए युद्ध की रिपोर्टिग अंग्रेजी के साथ ही हिन्दी एवं अन्य भाषाई समाचार-पत्रों और समाचार एजेंसियों द्वारा कुछ विस्तार से की गई। फिर १९७१ में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम और उसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान द्वारा पूरब और पश्चिम में एक साथ भारत के विरूद्ध मोर्चे खोल दिए जाने पर पहली बार भारतीय मीडिया ने समरक्षेत्र के बहुत निकट पहुंचकर घटनाक्रम की रिपोर्टिंग की। उस दौरान पत्रकारों ने कुछ जोखिम उठाकर युद्ध-क्षेत्र के जीवंत वृतांत प्रस्तुत किए। "धर्मयुग" के संपादक श्री धर्मवीर और साहित्य, पत्रकारिता एवं राजनीति में समान रूप से सक्रिय श्री विष्णुकांत शास्त्री ने बंगलादेश मुक्ति संग्राम का आंखो देखा जो विस्तृत विवरण सिलसलेवार प्रकाशित किया, वह हिंदी में परिपक्व "प्रतिरक्षा रिपोर्टिंग का उत्कृष्ठ उदाहरण था! परंतु तब भी भारतीय पत्रकारिता में प्रतिरक्षा रिपोटिंग की स्वतंत्र शाखा विकसित नहीं हो पाई थी। स्थितियां अब तेजी से बदल रही है। कारगिल युद्ध के बाद से भारतीय मीडिया में "प्रतिरक्षा रिपोर्टिंग" का महत्व समझा जाने लगा है। पत्रकार एवं संस्कृतिकर्मी श्रीमती शालीना चतुर्वेदी द्वारा संकलित जानकारी के अनुसार कारगिल युद्ध में मेजर पुरूषोत्तम चौबें ने दोहरी भूमिका निभाई थी। हथियारों से लैस वह युद्ध क्षेत्र में डटे ही थे, परंतु उसके साथ ही समर-रिपोर्टिंग का दायित्व भी वह समय-समय पर संभालते रहे। पत्रकार मित्रों की जान बचाते हुए ही मेजर चौबे ने शहादत दी थी। इसी प्रकार कर्नल जौली ने भी पत्रकारिता का विधिवत् प्रशिक्षण लिया मेरा ऐसे कुछ सेनाधिकारियों से परिचय रहा है, जो सेना से सेवानिवृत्ति लेकर पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हुए और प्रतिरक्षा विशेषज्ञ के रूप में नाम भी कमाया।२९ अध्यायों में बटी श्री पटैरया की पुस्तक में भारतीय महाद्वीप के संदर्भ में भारत की सुरक्षा चिंताओं को रेखांकित करते हुए, देश की सामरिक शक्ति तीनों सेनाओं थल, जल और नभ की न केवल सार्मथ्य की व्यवस्था की गई है, बल्कि अतीत में हुए रूद्धों का सिलसिलेवार विवरण भी दिया गया है। निश्चिततौर पर यह पुस्तक केवल प्रतिरक्षा पत्रकारिता के छात्रों के लिए उपयोगी होगी, बल्कि उन लोगों को भी पसंद आएगी, जो भारतीय उपमहाद्वीप के रक्षा संदर्भो को, अपनी भाषा में पढ़ना चाहते है।
sabhar-dakhal.net

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