Thursday, December 10, 2009

अब सबसे पहले आम आदमी मीडिया के दरवाजे खटखटाता है

पिछले कुछ वर्षो से मीडिया की जिस तरह से आलोचना हो रही है, उसे उसके सरोकार और दायित्वबोध की याद दिलाई जा रही है, वह बात हैरत में डालने वाली है। यह किसी भी क्षेत्र की बढ़ती ताकत का ही सबूत है यह इसे साबित करता है कि मीडिया से लोगों की अपेक्षाएं बहुत बढ़ गई हैं कि बाकी स्तंभों से ज्यादा याद उसकी होती है । लोकतंत्र के तीन संवैधानिक स्तंभों से उपजी निराशा भी शायद इसका कारण है कि लोग हर बीमारी को मीडिया ताकत से ठीक करना चाहते हैं । पहले चलन यह था कि सभी दरवाजों से निराश आदमी अखबार के दफ्तर में आता था । आज वह सबसे पहले अखबार या निजी चैनल के दफ्तर पहुँचकर न्याय मांगता है । स्टिंग आपरेशन और भ्रष्टाचार कथाओं तक पत्रकारों की पहुँच खोज से कम, जनता के सहयोग से ज्यादा सफल हो रही है ।लोकतंत्र के प्रति हमारी व्यापक प्रतिबद्धता के बावजूद उसके तीनों स्तंभों-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के प्रति आम जनता का नैराश्य बढ़ा है । सामाजिक बदलाव के दौर से गुजरता देश जहाँ तेजी से आर्थिक प्रगति कर रहा है, वहीं समाज में असमानता भी बढ़ी है । ऐसी विविध स्तरों वाली सामाजिक रचना हमारे लिए चिंतन और चुनौती दोनों का विषय है । शायद यही कारण है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में निरूपित किए जा रहे मीडिया के प्रति लोगों की उम्मीदें और शिकायतें बहुत बढ़ गई हैं । पिछले १० वर्षो का समय सूचना और मीडिया के व्यापक प्रसार का है तो उससे बढ़ती जा रही अपेक्षाओं का भी है । राजनीतिक तंत्र के प्रति अनास्था का विस्तार तो लंबे समय से जारी है, किन्तु धीरे-धीरे प्रशासन और न्यायपालिका के प्रति भी ऐसे ही भाव रेखांकित किए जाने लगे । संवैधानिक तंत्र के प्रति उपजे नैराश्य ने मीडिया को बहुत ही अपेक्षाओं का केन्द्र बना दिया। जरा कड़ी भाषा में कहें तो मीडिया एक ऐसा कंधा है जिसकी तलाश में हर आदमी है । मीडिया ही आपकी लड़ाई लड़े यह भाव प्रखर हो रहा है । दृश्य माध्यमों के हल्लाबोल ने इसे एक ऐसे शक्ति केन्द्र में तब्दील कर दिया है - जो आपकी हर समस्या का समाधान कर सकता है । उम्मीदों की यह बढ़ती हुई सीमारेखा, प्रभुवर्गो तक सीधी पहुँच, सवाल पूछने या खड़ा करने की ताकत ने मीडिया की महिमा बढ़ा दी है । आज मीडिया चौतरफा आलोचना का केन्द्र बन रहा है तो उसका सीधा कारण है कि वह जन अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रहा है । सूचना, शिक्षा, मनोरंजन से आगे उससे यह भी अपेक्षाएँ की जा रही हैं कि वह नैतिक पुलिस का काम करे । हर अन्याय से जूझे । आम आदमी प्रश्नों को उठाए। जबकि उसका अर्थतंत्र और बाजार की बढ़+ती शक्ति उसे पूर्णतः जनधर्मी रवैया अपनाने से रोकती है । बावजूद इसके मीडिया गहरे सामाजिक सरोकारों से जुड़कर काम कर रहा है । तमाम मुद्दों को सामने ला रहा है । भ्रष्टाचार, जनसुविधा के अभाव, संवेदनहीनता की कहानियाँ, स्टिंग ऑपरेशन, अपराध के पीछे चेहरों को मीडिया ही उजागर कर रहा है । कई मामलों में प्रशासन, पुलिस और सरकारी तंत्र से पहले पहुँचकर मीडिया अपने इस दायित्वबोधकी पुष्टि भी करता है । इस संदर्भ में खबरों को संज्ञान में लेकर दायर जनहित याचिकाएँ भी बिनी जा सकती हैं । मीडिया से बढ़ती जा रही उम्मीदें पूरा कर पाना संभव नहीं है । जाहिर है लोगों में मीडिया के प्रति असंतोष गहराता जाता है । नेता, पुलिस, बाबूराज से तंग लोग बड़ी उम्मीदों से चौथे स्तंभ की तरफ देखते हैं । वे यह आशा रखते हैं कि मीडिया उन्हें न्याय जरूर दिलाएगा । मीडिया ऐसे प्रसंगों पर संवेदनशीलता का रूख अपनाकर अपनी जनपक्षधरता का अपेक्षित प्रदर्शन भी करता है । जिससे मीडिया सत्ताधीशों, प्रशासन और प्रभुवर्गो के निशाने पर आ जाता है । यदि वह इनमें से किसी के दबाव में आ जाता है तो उसे आम आदमी या पीड़ित पक्ष की आलोचना का केन्द्र बनना पड़ता है । ऐसे में मीडिया के लिए तटस्थ रहकर अपना ईमानदार कार्य संपादन बेहद कठिन हो जाता है । हालात ऐसे हैं कि उसे हर हाल में आलोचना ही भुगतनी है । भ्रष्टाचार में आकंठ लिप्त राजनेता, अधिकारी भी मीडिया को नैतिक प्रवचन देने से बाज नहीं आते । मीडिया के दायित्वबोध पर जब ऐसे लोग वक्तव्य देते हैं तो बहुत दया आती है । प्रशासनिक-राजनैतिक तंत्र में पसरी संवेदनहीनता, संवादहीनता, भ्रष्टाचार, घूसखोरी कुछ ऐसे कारण हैं जिसके चलते मीडिया का उपयोग करने की प्रवृत्तियाँ बढ़ी हैं । इस उपयोगितावाद में मीडिया के लिए भी अच्छे-बुरे विचार मुश्किल हो जाता है । खबर जल्दी देने की त्वरा में कई बार तथ्यों की पूरी तरह पड़ताल नहीं हो पाती है । इस भ्रष्ट तंत्र में शामिल लोग भी एक-दूसरे के खिलाफ खबरें छपवाने के लिए मीडिया के इस्तेमाल की कोशिशें करते हैं । खबर पाने का लोभ शायद ही कोई मीडियाकर्ती छोड़ पाता हो । यह आपाधानी नये तरह के दृश्य रच रही है । सामाजिक अपेक्षाओं की पूर्ति हर स्तर पर करने के बावजूद कहीं न कहीं कमी रह ही जाती है । लोकतंत्र के तीन स्तंभ यदि अपनी भूमिका को पुनर्परिभाषित नहीं करते और अपने दायित्वबोध के प्रति सजग नहीं होते तो मीडिया की ताकत अभी और बढ़ेगी । यदि हमारा तंत्र संवेदनशीलता के साथ काम करे, अंतिम व्यक्ति को न्याय देने का सामर्थ्य विकसित करे तो हालात बेहतर होते नज+र आएंगे । अराजक स्थितियाँ खबरों के लिए स्पेस बनाती हैं । यह गंभीरता से सोचें तो हमारी राजनीतिक-प्रशासनिक और व्यवस्था की कुछ कमियों ने मीडिया की प्रभुता का आकाश बहुत बड़ा कर दिया । अब प्रभुवर्गो की सारी शक्ति इसी मीडिया को मैनेज करने लगी है । क्योंकि कोई भी खुद को आइने के सामने खड़ा करने को तैयार नहीं है । ऐसे में हमें अपने सामाजिक सरोकारों, दायित्वों को समझकर देश के प्रशासनिक-राजनीतिक तंत्र में भी वही संवेदना जगानी होगी, जिस संवेदना से मीडिया अपने दायित्वबोध को अंजाम देता आया है। शायद आलोचनाओं की जद में आज मीडिया इसलिए भी है क्योंकि लोगों की उम्मीदें सिर्फ उसी पर टिकी है । लोगों को भरोसा है कि मीडिया ही समाज में घट रहे अशोभन को घटने से रोक सकता है । मीडिया की आलोचना का तेज होता स्वर दरअसल उसकी बढ़ती स्वीकार्यता, शक्ति का ही प्रगटीकरण है।
संजय द्विवेदी
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)

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