Saturday, November 07, 2009

कितना भी लिखो कम पड़ ही जाएगा

भोपाल। वे क्या थे इस बारे में कुछ भी लिखना सूरज को रौशनी दिखने के बराबर ही है। में पत्रकारिता के क्षेत्र में नया हूँ और मात्र १० वर्ष में प्रभाष जे बारे में उनके नाम को जानने तक सीमित हूँ। अब वे नहीं हैं लेकिन हमारी कलम में रहेंगे। अनगिनत पत्रकार जो उनकी लाइन पर चलेंगे। प्रभाषजी को लोग कितना चाहते थे इसका प्रमाण ब्लॉग की दुनिया में लिखे गए अनगिनत लेख हैं। मीडिया मार्ग से लिए गए इस फोटो और तमाम ब्लॉग पर लिखे गए गए लेखों में से चुनिन्दा लेख अपने ब्लॉग पर साभार दे रहा हूँ, क्योंकि में खुद प्रभाषजी के बारे में कुछ लिख सकूँ ऐसी मेरी हसियत नहीं।
विनम्र श्रद्धांजलि।-भीम सिंह मीणा
---------------------------------------------------------------------------------------
मीडिया मार्ग लिखता है
प्रभाष जोशी को श्रद्धांजलि देने के लिए उमड़े पत्रकार , उनका पार्थिव शरीर आज शाम पहुंचेगा इंदौर , कल अंतिम संस्कार
हिन्दी पत्रकारिता से शिखर पुरूष प्रभाष जोशी के निधन से स्तब्ध पत्रकारों का हुजूम आज सुबह उनके अंतिम दर्शन के लिए उमड़ पड़ा । गाजियावाद के वसुंधरा स्थित उनके निवास स्थान पर जाकर सैकड़ों पत्रकारों ने उनके पार्थिव शरीर पर पुष्प चढ़ाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी । प्रभाष जोशी को कल रात क्रिकेट मैच देखने के तुरंत बाद दिल का दौरा पड़ा था । कुछ ही देर में उन्हें अस्पताल ले जाया गया लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका । सुबह होते - होते उनके निधन की खबर पूरे देश में फैल चुकी थी । उनके घर के बाहर दिल्ली के सैकड़ों पत्रकार जमा हुए । हर पत्रकार की जुबान पर एक ही बात थी , प्रभाष जोशी के निधन से हिन्दी पत्रकारिता में एक ऐसा खालीपन आया है , जिसे कभी भरा नहीं जा सकता ।प्रभाष जोशी दो दिन पहले ही लखनऊ से आए थे । आज सुबह उन्हें मेघालय की यात्रा पर जाना था । लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था । प्रभाष जोशी का पार्थिव शरीर दोपहर एक बजे गांधी शांति प्रतिष्ठान ले जाया गया , वहां कुछ देर तक उनके शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा , फिर राजकीय विमान से इंदौर ले जाया जाएगा । प्रभाष जोशी चाहते थे उनकी मौत के बाद नर्मदा के किनारे की अंतिम संस्कार किया जाए ।प्रभाष जोशी के अंतिम दर्शन के लिए पत्रकारों के हुजूम में जितने लोग प्रिंट के थे , उतने ही टीवी के ।
------------------------------------------------------
दिल-ए-नादाँ लिखता है
सुबह मैंने बी।बी.सी. पर जब यह खबर पढ़ी तो तुम्हें फ़ोन लगाया.तुम सो रहे होगे तो रीवा डॉ.साहब(चंद्रिका प्रसाद चंद्र)का नं.मिलाया.वो इन दिनों बीमार हैं सो उनसे भी बात न हो सकी.मेंरे भीतर खालीपन और आँसू जमा हो रहे थे.किसी से बात करके मैं हल्का होना चाहता था.एक ही बात घुल रही थी मन में कि अब जनसत्ता का संपादकीय पेज क्या सोचकर देखूँगा.चुनौती देनेवाले,अन्याय के खिलाफ़ खड़े होनेवाले हस्तक्षेप कहाँ खोजूँगा.बहुत ईमानदार,सुलझी हुई और सहारा देनेवाली आवाज़ शांत हो गई है.इस आवाज़ का इस तरह अचानक शांत हो जाना उस निडर लौ का बुझना है जो बेहद अँधेरे और उलझे वक्त में साथ देने के लिए जलती है.इस आवाज़ के पूरी तरह नियति के द्वारा चुप कर देने को सह सकना इसकी जगह को भर पाना बहुत मुश्किल है.कल रात में राजकिशोर जी को उनके ब्लाग में पढ़ रहा था तो सोच रहा था प्रभाष जोषी और राजकिशोर जनसत्ता की ये दो आवाज़ें हमारे वक्त की उपलब्धि हैं.मैं प्रभाष जी से कभी मिला नहीं पर पढने से कभी चूका नहीं.जब भी उनका कोई इंटरव्यू टी.वी.,रेडियो या बी.बी.सी.पर सुना भूल नहीं पाया.जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री का पद लेने से इंकार किया था तो बी.बी.सी.के संवाददाता रेहान फजल ने पूछा था इसमें कितनी राजनीति है तो उनका जवाब था राममनोहर लोहिया ने कहा था धर्म दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीति अल्पकालिक धर्म. सोनिया गांधी के इस निर्णय में भी राजनीति है पर राजनीति का रास्ता अगर त्याग से होकर जाता है तो वही सच्चा रास्ता है और दूर तक जाता है.यह अपने समय की राजनीति के मूल्यांकन की उनकी दृष्टि है.मैं इस समय में ऐसा अभागा हूँ जिसने आज तक एक भी क्रिकेट मैच पूरा नहीं देखा.पर प्रभाष जोषी का क्रिकेट पर लिखा शायद ही छोड़ा हो.वे क्रिकेट के कवि थे.मैं ख़ुद को हल्का करने के लिए आज कक्षाओं में जबरन प्रभाष जोषी पर ही बोलता रहा.एक बात जो मेंरे मुह पर बार बार आ रही थी वो ये कि प्रभाष जी को अभी दुनिया से जाना नहीं था.वो अलविदा कह गए इसमें यही तसल्ली की बात है कि क्रिकेट के इस प्रेमी को मैच देखते ही मरना था.कुछ और करते हुए वो संसार से विदा होते तो शायद उनकी आत्मा को शांति नहीं मिलती.लंच में घर आकर जब तुम्हारा लेख देखा तो इस बात से भर आया कि ऐसी ही बात तुम उसी वक्त में लिख रहे थे.मैं एक बात अक्सर सोचता हूँ कि आज जब बड़े से बड़ा पत्रकार ज़्यादा तनख्वाह की पेशकश पर कोई भी अखबार छोड़ सकता है तब प्रभाष जी ने अपना सर्वोत्तम जनसत्ता के लिए दिया.पेशे में सरोकार इसी रास्ते आते हैं.बड़े जनसमूह से कोई इन्हीं शर्तों पर जुड़ता है.करियरिस्ट अवदान सफल होता है पर सार्थक उदात्त श्रम ही होता है.अपने इसी स्वाभाव के कारण प्रभाष जी अवसरवाद के प्रबल आलोचक बने होंगे.उनकी भाषा सबको समझ में आती थी तो यह व्याकरण की नहीं इमानदारी की वजह से था.मैं तो उन पर लगभग निर्भर करने लगा था कि इस विषय पर प्रभाष जी को पढकर अंतिम राय बनाउँगा.अब ऐसी कोई आश्वस्ति मेरे सामने नही होगी.पिछले दिनों जगदीश्वर चतुर्वेदी आदि उनका जिस तरह चरित्र हनन कर रहे थे उससे मैं बहुत आहत था.सुबह इन्हीं महोदय की मोहल्ला लाइव पर श्रद्धांजली देखी तो चर्चित लेखक कांतिकुमार जैन का आचरण याद आ गया.कांतिकुमार जैन ने शिवमंगल सिंह सुमन का ऐसा ही चरित्र हनन चंद्रबरदाई का मंगल आचरण नामक संस्मरण लिख कर किया था.इसके कुछ ही दिनों बाद जब उनकी मृत्यु हुई तो हंस में ही बड़ी विह्वल श्रद्धांजली लिखी.ऐसे समर्थ लोग अपनी ही बात की लाज नहीं रख पाते.यह ज्यादा चिंताजनक है.प्रभाष जी का मूल्यांकन करने को काफ़ी लोग हैं.हम कहाँ लगते हैं.मैं उनके अवदान को किसी पैमाने में कस सकूँ इस लायक भी नहीं.सिर्फ़ तुमसे कुछ बाँटना चाहता हूँ.क्योंकि यह दिली मजबूरी लग रही है.यहाँ तमिलनाडु में बारिश का मौसम शुरू ही हुआ है.पिछले तीन दिन से बारिश हो रही है.सुबह खबर पढ़ने के बाद जब मैं खाना खाने बैठा तो लगा शमशान से लौटा हूँ और प्रभाष जी के अंतिम संस्कार के बाद पत्तल फाड़ने की हृदय विदारक रस्म में बैठा हूँ.मैं दिन भर समझना चाहता रहा कि जिससे एक बार भी नही मिला उसके बारे में ऐसा क्यों लग रहा है जैसे अपने ही घर का कोई बुजुर्ग हमेशा के लिए छोड़कर चला गया.इसे नियति भी मान लूँ तो इससे उदासी बढ़ती है कि अब चरमपंथियों,अवसरवादियों,भ्रष्टों,सरोकारों से विमुख लोंगों को कौन ललकार कर लिखेगा?किसकी विनम्र हिदायतें श्रेष्ठ का सम्मान करना सिखाएँगी?- शशिभूषण
------------------------------------------------------------
नवभारत टाईम्स ब्लोग्स लिखता है
प्रभाष जी नहीं रहे!! नहीं- नहीं, प्रभाष जोशी नाम का कोई और पत्रकार होगा... सुबह ऑफिस पहुंचते ही टीवी पर देखा तो यकीन नहीं हुआ। मौत कोई अनोखी बात नहीं। फिर भी अक्सर हैरान करती है। मैं उनसे कभी मिली नहीं लेकिन उनकी शैली और कमाल की भाषा को अपने लेखन में उतारने की हमेशा कोशिश की। याद आ रहा है वह वाकया जो एक पत्रकार मित्र रोहित ने बताया था। कई साल पहले वह ग्रेजुएशन के प्रोजेक्ट के सिलसिले में कुछ संपादकों के इंटरव्यू करने गए थे। आपसे उन्हीं की ज़ुबानी शेयर कर रही हूं प्रभाष जी के व्यक्तित्व का एक पहलू। आप भी देखें, सादा जीवन उच्च विचार का हाल तक जीवंत यह उदाहरण कैसा था...
"मुलाक़ात वाले दिन तय समय पर हम उनके निर्माण विहार वाले घर पर जा ही रहे थे कि रास्ते में एक आदमी बरमूडा शॉर्ट्स और टीशर्ट पहने हुए प्रभाष जी जैसा दिखा। अभी तक हमने प्रभाष जी को सिर्फ धोती और कुर्ते में ही देखा था इसलिए हैरानी तो हुई मगर नज़दीक जाकर उन्हें पहचान लिया। हमने बताया कि आपने मिलने का वक़्त दिया था तो उन्होंने कहा कि मैं अभी सैर करके आता हूं। तुम लोगों को घर तो पता ही है, घर जाकर बैठो। हम प्रभाष जी के घर तो पहुंच गए मगर इतनी बड़ी हस्ती के घर के अन्दर घुसने की हिम्मत नहीं हुई। गर्मी होने के बावजूद उनके घर के बाहर उनके इंतज़ार में खड़े रहे। प्रभाष जी आए और उन्होंने नाराज़ चेहरे से हम तीनों को घूरकर देखा। हमसे पूछा, जब तुम्हें अन्दर जाकर बैठने के लिए कहा था तो गर्मी में बाहर क्यों खड़े थे? मैंने इस बात को टालने की कोशिश की मगर मेरे मित्र ने कहा कि किसी ने हमें अन्दर आने के लिया कहा ही नहीं। प्रभाष जी हमें आदर के साथ अन्दर लेकर गए और अंदर घुसते ही सबसे पहले अपनी पत्नी से शिकायत की कि इन बच्चों को आपने अन्दर आने के लिए क्यों नहीं कहा। हालांकि गलती उनकी पत्नी की भी नहीं थी क्योंकि उन्हें पता ही नहीं था कि हम उनके घर किसी से मिलने आए हैं। यह बात बेशक बहुत छोटी-सी थी, लेकिन प्रभाष जी की महानता देखिए, वह बोले कि उन्हें हमारा यानी अपने मेहमानों का यूं बाहर खड़े रह जाना अच्छा नहीं लगा। खैर इसके बाद हमने प्रभाष जी का बारी-बारी से इंटरव्यू किया जिसमें उन्होंने उम्मीद से कई कदम आगे बढ़कर शानदार जवाब दिए थे। इंटरव्यू के बाद जब प्रभाष जी ने हमारे घर-परिवार के बारे में पूछा तो हमें बहुत हैरानी हुई कि इतना बड़ा संपादक हम जैसे स्टूडेंट्स के साथ भी कितनी जल्दी कितना घुल-मिल गया है। प्रभाष जी ने हमें अपनी छोटी-सी पोती से मिलवाया और उस दिन उन्होंने हमारे साथ खूब हंसी-मज़ाक भी किया। हम तीनों मित्र उस समय एक ही बात सोच रहे थे कि इतना गंभीर दिखने वाला आदमी भीतर से कितना सरल और सहज है।
मुलाक़ात में प्रभाष जी ने यह भी बताया कि उन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत कैसे की थी। प्रभाष जी ने बताया था कि 1960 के आसपास (साल मुझे ठीक से याद नहीं है) एक टेस्ट मैच चल रहा था। उन दिनों किसी के घर में रेडियो होना भी बहुत बड़ी बात थी। प्रभाष जी के घर में रेडियो नहीं था सो उन्होंने अपने इलाके के फायर स्टेशन के अधिकारियों के दफ्तर के बाहर पांचों दिन सुबह से शाम तक मैच की कॉमेंट्री सुनकर उस पर एक फीचर लिखा और उसे इंदौर के अखबार 'नई दुनिया' में छापने के लिया भेज दिया। उस समय किसे पता होगा कि यह आदमी आगे चलकर न सिर्फ इतना बड़ा पत्रकार बनेगा, बल्कि इतना महान इंसान भी बन जाएगा कि हम जैसे युवा पत्रकारों के लिए उनकी लेखनी और उनका जीवन दोनों ही प्रेरणा बन जाएंगे।
उस मुलाक़ात को पांच साल से ज्यादा हो चुके हैं। उसके बाद मैं पत्रकारिता में बहुत सारे लोगों से मिला। कई बहुत अच्छे लोग भी मिले, लेकिन प्रभाष जी जैसा कोई नहीं मिला जो असाधारण संपादक तो थे ही और असाधारण इंसान भी थे।"- पूजा प्रसाद
------------------------------------------------------------
विस्फोट डॉट कॉम लिखता है
एक विकट क्रिकेटप्रेमी को क्रिकेट जगत की श्रद्धांजलि
सचिन की आतिशी पारी के बावजूद भारत की हार के साथ हिंदी पत्रकारिता के शिखर पुरुष और क्रिकेट के जबर्दस्‍त रसिक प्रभाष जोशी इतने मायूस हुए कि दुनिया को ही अलविदा कह दिया। प्रभाष जी- जो क्रिकेट और टेनिस के दीवाने थे- अपने शब्दों के जरिए पाठकों और क्रिकेटप्रेमियों की चेतना को झकझोरते रहे, सचिन के 17 हजार रनों पर लिखने की तमन्‍ना को दिल में लिए ही जहां से कूच कर गए। अफसोस, उनका सफर वहां खत्म हुआ, जहां असंभव को संभव बनाने देने वाले सचिन तेंदुलकर अपने आसाधारण खेल से दुनिया की नंबर एक क्रिकेट टीम ऑस्ट्रेलिया के मुंह से जीत को छीन कर भारत के हक में लाते-लाते रह गए। जहां सचिन सबसे ज्यादा रन बनाकर भी टीम को जीत नहीं दिला पाए, उसी तरह प्रभाष जोशी भी सचिन तेंदुलकर के रिकॉर्ड पर लिखने से पहले चले गए ...दरअसल, प्रभाष जी पेशेवर पत्रकार की तरह क्रिकेट पर कलम नहीं चलाते थे, बल्कि एक विकट क्रिकेटप्रेमी की तरह इस खेल और इसके खिलाडि़यों पर अपनी भावनाएं व्‍यक्‍त करते थे। क्रिकेट के प्रति उनके प्रेम को लेकर खेल पत्रकार अमित रायकवार ने देश के कुछ बड़े क्रिकेटरों और खेल संपादको से खास बातचीत की। प्रस्‍तुत है संपादित अंश:सुरेश कौशिक, खेल संपादक, जनसत्‍ताप्रभाष जी जैसा संपादक नहीं मिल सकता, जो खेल को बढ़ावा दे। शुरूआत से ही उन्होनें खेल को जनसत्‍ता का मजबूत पहलू बनाया। उनका एकमात्र लक्ष्य था कि हम खेलों के मामले में इंग्लिश अख़बारों से मुकाबला करें, किसी भी मायने में उनसे पीछे नहीं रहें। यही वजह थी जनसत्‍ता शुरूआती वर्षों में हमने रात 3:30 बजे 1986 में मेक्सिको में हुआ फुटबॉल वर्ल्ड कप टेलीविजन पर देखकर कवर किया। पहले पेज पर उस विश्‍वकप के हीरो और फुटबॉल के महानतम खिलाडि़यों में से एक माराडोना की तस्‍वीर थे। सुबह जब लोगों के हाथ में अखबार आया, तो सब हैरान थे कि सुबह साढे तीन बजे खत्म होने वाले मैच कैसे सबके सामने आ गया। वो चाहते थे कि खेलों में हम सबको पछाड़ें, इसलिए देर रात तक काम करके हमने ताजा से ताज़ा खबरे दीं। उनका क्रिकेट प्रेम जगजाहिर है। क्रिकेट के तो वे किताबी कीड़े थे। सन् पचास से लेकर सचिन तक, अब तक जितने खिलाड़ी हुए, वे कैसा खेलते थे, वो उनको मुंहजबानी रटा हुआ था। खास तौर पर वो सुनिल गावस्कर और सचिन तेंदुलकर के बड़े प्रशंसक थे। सचिन की तो वे आलोचना भी नहीं सुन सकते थे। उनके राज में चाहे शतरंज हो या स्नूकर या फिर हो कुश्ती, फुटबॉल, सभी को अच्छी तरह कवर किया गया। और, खेल पर वे एक बड़ा पन्ना निकालते थे... वो पन्ने आज भी लोगो ने बड़े संभालकर रखे हुए हैं यादगार के तौर पर।प्रदीप मैग्जीन, खेल सलाहाकार, हिंदुस्‍तान टाइम्‍सप्रभाष जी क्रिकेट के असली दीवाने थे। मुझे याद है जब 1977-79 में वे चंढीगढ़ में इंडियन एक्प्रेस के संपादक थे, तब इंडियन एक्‍सप्रेस के एक टेक्नीशियन के पास एक टेलीविजन हुआ करता था और वे कुछ जुगाड़ करके भारत-पाकिस्तान का मैच देखते थे। मैं भी उनके साथ मैच देखता था। वो पूरे नौ से पांच बजे तक एक छोटे से रूम में क्रिकेट देखते रहते थे। उसी दौरान उनसे मुलाकात हुई और क्रिकेट पर काफी डिस्‍कशन होने लगे। फिर उन्होनें मुझे इंडियन एक्प्रेस अख़बार में नौकरी का ऑफर दिया। अंग्रेजी और हिंन्दी दोनों भाषाओं पर उनकी जबर्दस्त पकड़ थी।प्रभाष जी क्रिकेट के मौजूदा हालात को देखते हुए काफी दुखी रहते थे। आईपीएल और इतना पैसा खेल को बरबाद कर रहा है। वो बडे़ प्‍योरिस्ट और ट्रेडिशनल थे। उन्हें इस बात का हमेशा दुख रहता था कि आज का क्रिकेट वो पुराना वाला क्रिकेट नहीं रहा। वो आज भी क्रिकेट पर इतना ही अच्छा बोलते थे, जितना पच्चीस साल पहले। क्रिकेट के नॉलिज में उनका कोई मुकाबला नहीं था और वो क्रिकेट की टेक्निकल चीज़ों के बारे बहुंत जानते थे। युवावस्‍था में वे खुद भी क्रिकेट के बहुत अच्‍छे खिलाड़ी रहे थे और लेफ्ट आर्म स्पिन गेंदबाजी करते थे। उन्हें अपने छोटे बेटे से काफी उम्मीदे थी कि वो आगे चलकर हिंदुस्तान के लिए खेलेगा। उनके छोटे बेटे हरियाणा से रणजी ट्रॉफी खेले थे।प्रभाष जी में सबसे बड़ी खूबी ये थी कि वो बहुत ईमानदार थे। जिन खेल पत्रकारों को क्रिकेट की नॉलिज होती थी, उन्हें वे बड़ा प्रोत्‍साहित करते थे। मुझे भी उन्होने काफी प्रोत्‍साहित किया। उनकी वजह से मेरे कॅरियर को सही दिशा मिली। अक्सर वे बड़े मैच मुझे कवर करने के लिए दिया करते थे, जिसकी वजह से मेरा कॅरियर अच्छा बन पाया। पॉलिटिक्स की समझ की वजह से उनकी क्रिकेट की पॉलिटिक्स की समझ काफी अच्छी थी। कपिल देव ने जब क्रिकेट खेलना शुरू किया और जब कपिल किसी विदेशी दौरे पर जाते थे, तो प्रभाष जी अपने पास कपिल को बुलाते थे और समझाते थे कि 'डाउन टू अर्थ' रहो, ग्लैमर की दुनिया आदमी को ख़राब भी कर सकती है। अगर क्रिकेट के प्रति आपकी कमिटमेंट रहेगी तो आप काफी आगे जाओगे। उन्होने काफी युवा खेल पत्रकारों को बढ़ावा दिया। जब 1982 में दिल्ली में एशियन गेम्स हुए, तब इंडियन एक्‍सप्रेस का सेंट्रल डेस्क बना और प्रभाष जी उसके हेड बने। उनके मार्गदर्शन में क्रिकेट अलावा बाकी खेलों को भी बढावा दिया गया। कई सीनियर क्रिकेटर उनकी काफी इज्जत करते थे। उनसे हमेशा सर, सर कहकर बात करते थे। उन्होंने क्रिकेट से जुड़े कई बड़े मुद्दों को उछाला और क्रिकेट को विस्‍तार से कवर किया, चाहे वो देश में हो या विदेश में।कपिल देव, भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तानकाफी नेक इंसान थे प्रभाष जी। जब हम छोटे से थे, काफी प्रोत्‍साहित किया करते थे हमें। उन्होंने हमारे साथ प्रेस जैसा व्यवाहर नहीं किया। जब भी मुझे उनकी जरूरत होती थी, तो वो हमेशा मेरे साथ खड़े होते थे। उन्होने जिंदगी हमसे कहीं ज्यादा देखी थी... अपने अनुभव से वो हमेशा मुझे समझाते रहते थे। क्रिकेट के वे बहुत बड़े लेखक थे। बाद में वो दिल्ली आ गए, फिर उनसे थोड़ा संपर्क छूट गया, लेकिन जब भी मिलते थे, पुराने दिनों को याद करके उनमें खो जाया करते थे।बिशन सिंह बेदी, भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तानवे बहुत ही क्वालीफाइ राइटर थे। जर्नलिज्‍म की दुनिया में बहुत आदरणीय शख्सियत थे। अपने निजी फायदे के लिए नहीं लिखते थे और उसूलों वाले व्यक्ति थे। मेरे क्रिकेट कॅरियर के दौरान उन्होंने मुझे काफी क्रिटिसाइज भी की, लेकिन मैंने हमेशा उनकी बातो को पॉजिटिव लिया।चेतन चौहान, पूर्व सलामी बल्लेबाज़, भारतीय क्रिकेट टीमकाफी स्पष्टवादी जर्नालिस्ट थे। फ्रैंक थे, ब्‍लंट थे और बहुत ही ईमानदारी से पत्रकारिता करते थे। वो एक ऑलराउंडर खिलाड़ी थे, जितनी जानकारी उनकी पॉलिटिक्स में थी, उतनी ही क्रिकेट में। एक बड़ा ऊंचा स्थान था उनका पत्रकारिता में। उनके ना होने से पत्रकारिता जगत की बड़ी क्षति हुई है। अक्सर जब उनसे क्रिकेट के बारे में बाते होती थीं, तो सुनकर आश्‍चर्य होता था कि उन्हें क्रिकेट की कितनी नॉलिज है।-अमित रायकवार, खेल पत्रकार

No comments:

हर तारीख पर नज़र

हमेशा रहो समय के साथ

तारीखों में रहता है इतिहास