Saturday, May 23, 2009

नेतागिरी हमें नेताओं के लिए छोड़ देनी चाहिए-सरदेसाई


आईबीएन-7 के राजदीप सरदेसाई का एक साक्षात्कार बीबीसी पर प्रकाशित हुआ तो में उसे अपने ब्लॉग पर लेने से नही रोक सका। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश

-काफ़ी छोटी उम्र में आपने मीडिया में इतना नाम कमाया?
नहीं ऐसा नहीं है. अगर मेरे बाल देखें तो ये पक गए हैं. वरना महज़ 43 साल की उम्र में लोगों के बाल नहीं पकते. लेकिन टेलीविज़न ऐसा माध्यम है जिसमें बाल जल्दी पक जाते हैं. पिछले 20 साल में प्रिंट और मीडिया में काम करते हुए खूब मज़ा आया. लेकिन ये भी कहूँगा कि उम्र भी हो गई है.
-लोगों का कहना है कि आप भारत के सबसे अग्रणी और चहेते न्यूज़ ब्रॉडकास्टर हैं. आपका क्या कहना है?
ये जाँच परख दर्शक करते हैं. दरअसल, मैं बताना चाहूँगा कि टेलीविज़न में मेरा आना महज़ संयोग था. मैं दिल्ली आया था. प्रणॉय रॉय ने फ़ोन कर मुझे बुलाया. मैं उनसे मिला. मैंने सोचा कि चलो एक साल तक इसे भी करते हैं. मैं कहना चाहूँगा कि हम भाग्यशाली थे, ज़्यादा प्रतिस्पर्धा नहीं थी. दर्शकों के पास ज़्यादा विकल्प नहीं थे. राजदीप या फिर एक-दो चेहरों को देखने के अलावा और विकल्प नहीं था.
-आप जब टीवी पर लोगों का इंटरव्यू कर रहे होते हैं या एंकरिंग कर रहे होते हैं तब तो इतने विनम्र नहीं दिखाई देते?
बात विनम्रता की नहीं है. सचमुच, मैं खुद को सेलेब्रिटी नहीं मानता, बल्कि पत्रकार मानता हूँ. मुझे लगता है कि कोई भी व्यक्ति चाहे वो टीवी, रेडियो या प्रिंट में हो अगर खुद को पहले पत्रकार नहीं मानेगा, आगे नहीं बढ़ेगा. ये सेलेब्रेटीहुड या पेज थ्री संस्कृति अब सामने आ गई है. अगर आप टेलीविज़न प्रोग्राम कर रहे हैं तो सेलेब्रेटी बन जाते हैं और लेकिन जो प्रिंट में अच्छा काम कर रहे हैं, उनका नाम सामने नहीं आता. देश में प्रिंट में कई पत्रकार हैं, जिन्होंने बहुत अच्छा काम किया है. लेकिन अब चूँकि टेलीविज़न लोगों के घरों के कमरों तक पहुँच गया है, इसलिए टीवी पत्रकार ज़्यादा बड़े हो गए हैं.
-अपनी पसंद का एक गाना बताएँ?
मुझे किशोर कुमार के कई गाने बहुत पसंद हैं. ‘चलते-चलते मेरे ये गीत याद रखना’ मुझे काफ़ी पसंद है. जब भी उनका जन्मदिन आता है मैं दर्शकों को उनका ये गाना ज़रूर सुनाता हूँ.
मुंबई से दिल्ली आने से पहले आप जाना-पहचाना नाम बन गए थे?
इस मामले में मैं काफ़ी भाग्यशाली था. मैंने पत्रकारिता में अपना करियर 1988 में शुरू किया. मैं 1994 तक मुंबई में रहा. तो 1988 से 94 तक काफ़ी कुछ हुआ. दंगे हुए, बम विस्फोट हुए. राजीव गांधी की हत्या, मंडल, मंदिर आंदोलन, शरद पवार की प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदारी बहुत कुछ घटित हुआ. उस वक़्त मैं मुंबई में था और इस तरह से भाग्यशाली रहा. अक्सर ये देखा गया है कि पत्रकारिता में भाग्य की बहुत ज़रूरत होती है. मसलन आप किसी जगह पर हैं और वहाँ कोई विस्फोट हो जाए तो पत्रकार के लिए बड़ा दिन होता है.
-मुझे नहीं पता कि इन दिनों आप किस कार में चलते हैं, लेकिन आप जब दिल्ली
में आए तो आपके पास कौन सी कार थी?
मैं जब दिल्ली आया तो कुछ दिनों के लिए मैंने अपने ससुर से एक कार ली थी, लेकिन उन्होंने ये कहकर इसे वापस ले ली कि मैं बहुत पेट्रोल फूँक रहा हूँ. फिर मैं करोलबाग गया और मैंने सफेद रंग की सैकंडहैंड फिएट खरीदी थी और ये बहुत अच्छा दौर था. मुझे लगता है कि हम अब पत्रकारिता का आनंद नहीं उठा पा रहे हैं. उस ज़माने में एक स्टोरी के लिए हफ्ते-महीने का समय होता था. तीन घंटे का लंच होता था. आज कई टेलीविज़न चैनल हो गए हैं और प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है. दो-दो घंटे ब्रेकिंग न्यूज़ या न्यूज़ फ्लैश चलता है. लंच 15 मिनट में ही करना होता है.
-ब्रॉडकास्टिंग की दुनिया का शुरुआती दौर कैसा रहा?
बहुत मुश्किल था. मैंने कभी टेलीविज़न के बारे में सोचा भी नहीं था. मुझे याद है कि बांग्लादेश में तस्लीमा नसरीन का एक शूट करना था. वो मिल ही नहीं रहीं थी. सुरक्षा बल हमारे पीछे लगे थे. बड़ी मुश्किल के बाद वो मिलीं. फिर टेप रोल नहीं हो रही थी. तब मेरे दिमाग में आया कि अगर मैं प्रिंट में होता तो कितनी आसानी से इंटरव्यू कर लेता. टीवी कुल मिलाकर टीम वर्क है ये समझने में मुझे समय लगा. लेकिन प्रणॉय और राधिका रॉय से बहुत समर्थन मिला. तब प्रतिस्पर्धा कम थी और प्रयोग करने के लिए बहुत वक़्त था. आज समय की कमी है, यही वजह है कि मुझे लगता है टीवी क्वांटिटी बढ़ गई है, लेकिन क्वालिटी गिरी है.
-आपको टीवी कैमरा सामना करते हुए अब 10-11 साल हो गए हैं, लेकिन शुरुआत में कितनी घबराहट होती थी?
मुझे लगता है कि मैंने अपने पहले पीस टू कैमरा यानी पीटीसी के 15-20 टेक किए होंगे. ब्रायन लारा ने भारत में कोई विश्व रिकॉर्ड तोड़ा था, मैंने उसके 15-20 टेक किए होंगे. एक और वाकया था जब नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी पहली बार सत्ता में पहुँची थी. प्रधानमंत्री मनमोहन अधिकारी का इंटरव्यू करने के बाद मैंने 10-12 टेक किए, लेकिन नहीं हुआ. रात भी हो गई थी, फिर अगले दिन उसी जगह पीटीसी के लिए जाना पड़ा. तो ये मेरे लिए नई चीज़ें थीं. स्वभाव से मैं शर्मीला हूँ, लेकिन मेरा मानना है कि कैमरे के साथ आपको एक रिश्ता बनाना पड़ता है. अच्छी बात ये है कि कैमरे पर आने के लिए आपको शाहरुख़ ख़ान या सलमान ख़ान होना ज़रूरी नहीं है, आप राजदीप सरदेसाई हैं तो भी टीवी में चल सकते हैं.
क्या ये सही बात नहीं है कि टीवी पत्रकारों को थोड़ा बहुत तो मॉडल या फ़िल्म अभिनेताओं की तरह होना चाहिए?
आप दुनिया भर में देखिए. टीवी पर वो पत्रकार अच्छा है जो अपनी बात अच्छी तरह से रख सके. मैं नहीं समझता कि पत्रकार होने के लिए आपका मॉडल होना ज़रूरी है.
आपके बचपन और आपके पिता की बात करते हैं. 1971 की सिरीज़ में दिलीप सरदेसाई का वेस्टइंडीज़ में शानदार प्रदर्शन. आपने कभी क्रिकेट खेलने के बारे में नहीं सोचा?
राजदीप सरदेसाई भारत के दिवंगत टेस्ट क्रिकेटर दिलीप सरदेसाई के पुत्र हैं मैंने बहुत कोशिश की. मैं हर शनिवार-इतवार को मैच खेलता था. स्कूल में क्रिकेट खेली. स्कूली क्रिकेट में पश्चिम क्षेत्र का नेतृत्व किया. मैं भारत के स्कूली लड़कों के संभावितों में था. देखिए, क्रिकेट और राजनीति में एक फ़र्क़ है. राजनीति में अगर आपके मां-बाप राजनीति में हैं तो आपको आसानी से टिकट मिल जाएगा, लेकिन क्रिकेट में काबलियत ज़रूरी है. तो कहीं न कहीं लोगों को ज़रूर लगा कि मेरे पिता अच्छे क्रिकेटर थे, लेकिन मैं नहीं हूँ. मुझे याद है कि ऑक्सफ़ोर्ड में पढ़ते हुए मैं पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कंबाइंड यूनीवर्सिटी के लिए खेल रहा था. अब्दुल क़ादिर ने चार गेंदें मुझे फेंकी और एक पर भी मेरा बल्ला नहीं लगा. तब सिली प्वाइंट पर खड़े सलीम मलिक का कहना था कि तुम भारत से हो और स्पिन खेलना नहीं जानते. तब मुझे लग गया था कि मैं न अब्दुल कादिर को खेल पाऊँगा और न उच्च स्तर की क्रिकेट खेल पाऊँगा. ये बात सही है कि पत्रकारिता में अधिकतर वो लोग आते हैं जो दूसरी चीज़ों में असफल रहते हैं. राजदीप सरदेसाई सचिन तेंदुलकर बनना चाहते थे, लेकिन नहीं बन सके.
आपको जब भी टीवी पर या किसी सेमिनार में सुनते हैं तो एक ख़ास तरह की ऊर्जा लगती है. क्या लगता है?
कई चीजों के बारे में मुझे लगता है कि ये सही है और ये गलत है. मेरा मानना है कि पत्रकार के पास अपनी राय होनी चाहिए. जब ख़बर दे रहे हों तो कोशिश ये होनी चाहिए कि अपनी राय को इससे अलग रखें. लेकिन ख़बरों को लेकर जोश और भूख होनी चाहिए.
मुझे बचपन से ही अख़बार पढ़ने की आदत थी. मुझे याद है कि 1976 में अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव हुआ था और जिमी कार्टर राष्ट्रपति चुनाव जीते थे. मैं चुनाव देखने के लिए पूरे दिन अमरीकी सूचना केंद्र में बैठा रहा था.
आपने 1982 में सिद्धार्थ बसु की क्विज़ भी जीती थी?
हाँ, वो क्विज़ टाइम इंडिया प्रोग्राम था. हम फ़ाइनल में हार गए थे. मुझे सामान्य ज्ञान का बहुत शौक था. पत्रकारिता के लिए ये बहुत ज़रूरी भी है. आज कई लोग सिर्फ़ इसलिए आते हैं कि मीडिया में आकर मशहूर हो जाएँगे. मुझे लगता है कि पत्रकारिता की असलियत ख़बरों और सामान्य ज्ञान के प्रति भूख है न कि मशहूर होना.
लेकिन सच्चाई ये भी तो है अगर आपमें भूख है तो आप मशहूर हो ही जाएँगे?
मेरे मानना है कि हम लोग खुशकिस्मत हैं कि मीडिया के साथ-साथ बड़े हो रहे हैं. 14-15 साल पहले किसी ने नहीं सोचा था कि ऐसा ज़माना आएगा कि भारत में 70-80 निजी न्यूज़ चैनल होंगे. इसके अलावा कई ऐसे प्रोग्राम होंगे जो नेताओं को आड़े हाथों लेंगे. एक क्रांति हुई है और हम उसका हिस्सा रहे हैं. मैं तो ये भी कहूँगा, जब मैं प्रिंट में आया तो कई ऐसे लोग थे जो बहुत अच्छा लिखते थे. लेकिन समय के बदलाव में वो न जाने कहाँ खो गए.
आपमें पत्रकारिता का जोश दिखता है, बोलने का जोश दिखता है. क्या गर्लफ्रेंड को लेकर भी जोश था?
यही सबसे बड़ा दुख है. आप आज मुझे सेलेब्रेटी भले ही कहें. मैं अब 40 से अधिक का हूँ. अब कभी स्कूल, कॉलेज में जाता हूँ तो 18 साल की लड़की ऑटोग्रॉफ लेने आती है, लेकिन जब मैं 18-21 साल का था तब कोई नहीं आया.
आपका पहला क्रश?
ज़ीनत अमान. 13-14 साल की उम्र में हम लोग जैज़ यात्रा पर गए थे. तब हमने ज़ीनत अमान को देखा था. ‘यादों की बारात’ देखने के बाद मैं ज़ीनत अमान का बड़ा प्रशंसक हो गया था. दरअसल, क्रश आपका उनके साथ होता है जो आपको मिलते नहीं हैं.
आप अपने माता-पिता में से किसके ज़्यादा क़रीब थे?
मैं अपने पिता का बड़ा प्रशंसक हूँ. वो गोवा से खेलते थे और सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने दम पर भारतीय टीम के लिए खेले. मैं कभी-कभी लोगों से कहता भी हूँ कि महेंद्र सिंह धोनी से पहले मेरे पिता ही ऐसे शख्स थे. धोनी राँची से हैं, लेकिन मेरे पिता गोवा से थे, जहाँ क्रिकेट ना के बराबर था. गोवा में पैदा होकर भारतीय टीम से खेलने वाले वो इकलौते क्रिकेटर हैं. मुझे मेरी माँ से बहुत ऊर्जा मिली है. मेरी माँ ज़ेवियर कॉलेज में प्रोफेसर थी. मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा है. मेरे पिता ने हमेशा मेरा उत्साह बढ़ाया और कभी क्रिकेट खेलने के लिए मजबूर नहीं किया.
और फिर ऑक्सफ़ोर्ड कैसे पहुँचे?
मैंने ऑक्सफ़ोर्ड से क़ानून की शिक्षा ली. मैं किसी को भी वहाँ से क़ानून पढ़ने की सलाह नहीं दूँगा. बहुत पढ़ना पड़ता था. लेकिन ये सही है कि मैंने बहस करना वहीं से सीखा. पहली बार नौकायन किया. ब्रिटिश लोग बहुत ख़ास होते हैं. वो खेल को जिस तरह से खेलते हैं, वो वाकई बेहतरीन होता है. वो मानते हैं कि खेलना ज़रूरी है, हार-जीत ख़ास मायने नहीं रखते. मेरा वहाँ एक दोस्त था जो फिनलैंड का था अब वो वहाँ विपक्ष का नेता है.
आप कब राजनीति में आ रहे हैं?
नहीं, नेतागिरी हमें नेताओं के लिए छोड़ देनी चाहिए. अगर आपको अपने स्वतंत्र विचारों पर गर्व है और आप इन पर कायम रहना चाहते हैं तो आप नेता नहीं बन सकते क्योंकि नेता अपनी पार्टी का एक तरह से क़ैदी होता है. हाँ, मैं समाज के लिए कुछ योगदान करना चाहता हूँ, लेकिन पत्रकारिता के माध्यम से.
ऑक्सफ़ोर्ड के और किस्से या यादगार पल?
वो क्रिकेट वाला किस्सा ही. बात ये थी जब मैं ऑक्सफ़ोर्ड गया तो पता चला कि ब्रिटिश क्रिकेट की कितनी दुर्गति है. यहाँ मुंबई विश्वविद्यालय की टीम में मुझे जगह नहीं मिली, लेकिन ऑक्सफ़ोर्ड की टीम में मिल गई. शनिवार को प्रोफेसर के साथ फ़ुटबॉल मैच देखने जाते थे. दो साल तक खूब मज़ा किया.
ऑक्सफ़ोर्ड में पढ़ाई पूरी करने के बाद पत्रकारिता के बारे में कब विचार आया?
जब मैं मुंबई वापस लौटा तो छह महीने तक वकालत की. काला चोगा नहीं पहना था, लेकिन मेरी सनद मिल गई थी. मैं दादी इंजीनियर के साथ काम करता था. उन्होंने गायत्री देवी का केस मुझे दिया था. मैंने टाइम्स ऑफ़ इंडिया के लिए एक-दो कॉलम लिखे. दिलीप पडगाँवकर तब टाइम्स ऑफ़ इंडिया के कार्यकारी संपादक थे. उन्होंने मुझे गिरिलाल जैन से मिलाया. गिरिलाल जैन ने मुझसे कहा कि आप क्यों नहीं ट्रेनी सहायक संपादक के रूप में ज्वाइन करें. तब ये परंपरा थी आप ऑक्सफ़ोर्ड से आए हैं तो ट्रेनी असिस्टेंट एडीटर बनेंगे. मैंने ये पेशकश स्वीकार कर ली. तब मुझे वकालत के लिए कुछ नहीं मिलता था और ट्रेनी असिस्टेंट एडीटर के लिए मुझे 1500 रुपये मिलते थे. मैंने इसे स्वीकार कर लिया. मैं ये मानता हूँ कि मैंने इसे प्रयोग के रूप में लिया था. इसे एक साल के लिए आज़माना चाहता था. फिर लगा कि पत्रकारिता ही ठीक है.
पत्रकारिता में अब तक का सबसे यादगार पल?
राजदीप कहते हैं कि कारगिल युद्ध की पाकिस्तान से कवरेज काफ़ी मुश्किल रही बहुत मुश्किल सवाल है. कई पल हैं, लेकिन प्रणॉय रॉय के साथ चुनाव परिणामों की समीक्षा करना वाकई यादगार पल था. इससे पहले मैंने उन्हें दूरदर्शन पर विनोद दुआ के साथ देखा था. 1998 में उन्होंने मुझे मौका दिया, मुझे बहुत अच्छा लगा. मेरी उम्र तब 33 साल की थी, तब प्रणॉय रॉय ने मुझे को-एकरिंग का मौका दिया था. तब मतगणना 48 घंटे तक चला करती थी. तब भाजपा 180 सीटें लेकर आई थी. अंत तक ये पता नहीं चल रहा था कि कौन सी पार्टी सबसे आगे रहेगी. कोई और चैनल नहीं था और सारा देश आपको देख रहा था. पहले छह घंटों के लिए मैंने एक सेट बनाया था, जहाँ जयराम रमेश और गोविंदाचार्य थे. हम एक-एक सीट का विश्लेषण कर रहे थे.
इसके अलावा गुजरात दंगों की कवरेज, 1993 में मुंबई में बम विस्फोटों की कवरेज भी मेरे लिए बहुत यादगार रहीं.
पत्रकारिता में अब तक की सबसे मुश्किल कवरेज?
कारगिल युद्ध की पाकिस्तान से कवरेज सबसे मुश्किल काम था. मुसाहिद हुसैन ने मुझे पाकिस्तान का वीज़ा दिया था. मुझे नहीं पता कि बाद में उन्हें इसका अफ़सोस हुआ होगा कि नहीं. बाकी सभी लोग भारत की तरफ से इस युद्ध की कवरेज कर रहे थे. मुझे हमेशा लगता है कि किसी भी भारतीय पत्रकार के लिए पाकिस्तान से कवरेज करना बहुत रोमांचक अनुभव है. मुझे याद है कराची में एमक्यूएम को कवर करना, 1996-97 में वहाँ पॉप म्यूजिक आया तो उस पर लोगों की प्रतिक्रिया. ham लगभग दाऊद इब्राहिम के घर तक पहुँच गए थे. हम उस मकान से 50 मीटर दूर थे और हमारा कैमरामन घबरा गया था. पेशावर में फाटा गए और ये अनुभव भी शानदार रहा. इसके अलावा लालू यादव से जुड़ा भी एक वाकया है. 1990 में रथ यात्रा में जब लालू प्रसाद यादव ने आडवाणी को गिरफ्तार कराया तो मेरी उनसे पहली मुलाक़ात थी. 1995 में जब उन्होंने बिहार में चुनाव जीता तो उन्होंने मुझे सुबह 11 बजे का समय दिया. मुझे रात 11 बजे तक इंतज़ार करना पड़ा. तब उन्होंने मुझसे कहा कि आपको इंटरव्यू गोशाला में करना होगा. वो राजनीति के सुपर स्टार थे. लालू मीडिया का इस्तेमाल करने में माहिर हैं. मुझे लगता है उन्हें मास कम्युनिकेशन में डॉक्टरेट की उपाधि दी जानी चाहिए. लालू यादव के साथ 2003 में मैं पाकिस्तान गया था. तब भारत-पाकिस्तान के रिश्ते तनावपूर्ण थे. इस्लामाबाद में संडे मार्केट में गए तो उन्होंने एक आलू उठाया और कहने लगे कि यहाँ तो आलू छोटा होता है, बिहार में बड़ा होता है. वहाँ लोगों से पूछने लगे कि तुम तो यहाँ बिहार से आए होगे. यानी उन्हें लोगों को अपना बना लेने का जबर्दस्त हुनर है.
24 घंटे के न्यूज़ चैनल में काम करने और अपनी दिनचर्या के बारे में कुछ बताएँ?
एक डॉक्टर की तरह. हर समय मौजूद. मैं सुबह 10 बजे दफ्तर जाता हूँ, रात को साढ़े दस बजे लौटता हूँ. रविवार को मैं कुछ नहीं करता. मैं रविवार का दिन 14 वर्षीय बेटे इशान और बेटी तारिनी के साथ गुज़ारता हूँ. एक तरह से इस एक दिन मैं अपने बच्चों का ग़ुलाम हूँ.
एक बार किसी ने मुझसे कहा था कि मैं न्यूज़ वायर की तरह हूँ. जैसे न्यूज़ वायर बदलती है, वैसे मेरी ज़िंदगी बदलती है. मुझे याद है कि 26/11 के अगले दिन मुझे अपने दोस्त के साथ लंच करना था. सब कुछ तय था कि इंपीरियल होटल में लंच करेंगे और गप्पे मारेंगे. लेकिन तभी ये घटना हो गई और मैं उनसे नहीं मिल सका.
ख़बरों के अलावा और कौन सी चीज़ें उत्साहित करती हैं?
मुझे सिनेमा पसंद है. मैं सिनेमा हॉल में जाता हूँ. मुझे बाहर खाना खाना भी पसंद है. पुराने क्रिकेट मैच देखना मुझे पसंद है. संगीत और किताबें पढ़ना भी पसंद है.
किस तरह की फ़िल्में पसंद हैं?
हाल की फ़िल्मों में मुझे इक़बाल काफ़ी पसंद आई. मैंने अभी-अभी स्लमडॉग मिलियनेयर देखी है. शानदार फ़िल्म है. ये पूरी तरह से डायरेक्टर की फ़िल्म है. रहमान का संगीत भी अच्छा है. डैनी बॉयल की नज़रों से मुंबई को देखना अच्छा लगा.
आपके पसंदीदा अभिनेता, अभिनेत्री?
राजदीप सरदेसाई का कहना है कि उन्हें ज़ीनत अमान बहुत पसंद हैं अमिताभ बच्चन मुझे बहुत पसंद थे. 1973-1976 यानी ज़ंजीर से लेकर दीवार तक अमिताभ का दौर शानदार रहा. मैं विमान में एक बार जावेद अख़्तर साहब के साथ मिला और तब उनसे इस बारे में चर्चा हुई थी. तब उन्होंने कहा था कि दीवार की पटकथा सबसे अच्छी थी.
मौजूदा अभिनेत्रियों में पसंदीदा?
आज की अभिनेत्रियों में मुझे रानी मुखर्जी बहुत पसंद हैं. मैंने उनका इंटरव्यू लिया और कुछ मुश्किल सवाल पूछ लिए थे. उसके बाद उन्होंने मुझसे कहा कि वो फिर मुझे कभी इंटरव्यू नहीं देंगी.
आपकी नज़र में सबसे खूबसूरत अभिनेत्री?
मैंने इंडियन आइडल शो में सोनाली बेंद्रे को देखा. मुझे नहीं पता कि वो फ़िल्मों में लंबी पारी क्यों नहीं खेल सकीं. सुष्मिता सेन भी मुझे पसंद हैं. मुझे आज भी लगता है कि सुष्मिता सेन ऐश्वर्या राय से ज़्यादा सुंदर हैं.
सबसे करिश्माई व्यक्ति, जिसका आपने इंटरव्यू किया हो?
ये वाकई मुश्किल सवाल है. करिश्माई शब्द बहुत कठिन है. मुझे लगता है कि अटल बिहारी वाजपेयी का व्यक्तित्व करिश्माई है. नरेंद्र मोदी और बाल ठाकरे का इंटरव्यू करते हुए भी मज़ा आया. बिल क्लिंटन के साथ भी एक बार इंटरव्यू करने का मौका मिला. उनका व्यक्तित्व शानदार था. मुझे तो लगता है कि अगर क्लिंटन अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव के लिए फिर खड़े होते तो जीत जाते.
पत्नी सागरिका के साथ मुलाक़ात कैसे हुई?
हमारी पहली मुलाक़ात 1986 में हुई. हम दोनों ने एक ही स्कॉलरशिप के लिए अप्लाई किया था. केवल तीन लोगों को स्कॉलरशिप मिली जिसमें सागरिका थी और मैं नहीं था. फिर मैं ऑक्सफ़ोर्ड चला गया. इस दौरान सागरिका से ज़्यादा मुलाक़ात नहीं हुई.
मैं जब ऑक्सफ़ोर्ड से वापस आया और टाइम्स ऑफ़ इंडिया ज्वाइन किया. कुछ समय बाद सागरिका ने भी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ज्वाइन किया. लेकिन मैं मुंबई में था और वो दिल्ली में थी. फ़ोन पर लंबी-लंबी बातें होती थी. तो एक दिन संपादक के सचिव ने कहा कि फ़ोन के इतने लंबे-लंबे बिल की बजाए आप उनसे मिल ही लीजिए.
तो सागरिका को आपने प्रपोज़ किया?
अगर आप मुझसे ये सवाल पूछेंगे तो मैं कहूँगा कि सागरिका ने मुझे प्रपोज़ किया, लेकिन अगर यही सवाल सागरिका से पूछेंगे तो वो कहेंगी कि मैंने उन्हें प्रपोज़ किया. चलो आज इस बात को यहीं खत्म कर देते हैं कि मैंने उन्हें प्रपोज़ किया.
ऐसा कुछ जो आप भविष्य में करना चाहते हैं?
साफ़ कहूँ तो नहीं. मैं ऐसे मुक़ाम पर पहुँचना चाहता हूँ कि लोगों की सेवा कर सकूँ. मैं चैरिटी या राजनीति की बात नहीं कर रहा हूँ. मैं लोगों को एक जैसी शिक्षा दिलाना चाहता हूँ.
राजदीप अपने नज़रों में क्या हैं?
मैं समझता हूँ कि मैं ईमानदार प्रोफेशनल हूँ और एक अच्छा इंसान हूँ.

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