- खबर है कि मध्य प्रदेश सरकार ने अपने यहां पाठ्यपुस्तकों से सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता से वह एक लाइन हटवा दी है जिससे सिंधिया राजघराने के अंग्रेजों के मित्र होने का पता चलता है, जिससे पता चलता है कि सिंधिया राजघराने ने रानी लक्ष्मीबाई का नहीं बल्कि अंग्रेजों का साथ दिया था, जिससे पता चलता है कि सिंधिया राजघराने ने आजादी के आंदोलन के दिनों में गद्दारी की थी और गोरों का साथ दिया था.
- आजादी के बाद इन्हीं सिंधियाओं ने चोला बदलकर कांग्रेस से लेकर भाजपा तक की टोपी पहन ली और सत्ता-सिस्टम के पार्ट बन गए.
- चूंकि मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार है और भाजपा में ज्यादातर राजे-रजवाड़े-सामंत किस्म के लोग ही नेता, सांसद, मंत्री बनते हैं, सो लगता है कि सिंधिया राजघराने के नए नेताओं ने शिवराज सरकार को प्रभाव में लेकर अपनी बदनामी वाली कहानी को डिलीट करा दिया है. यहां कविता की वो लाइन बोल्ड में दी जा रही है जिसे पाठ्यपुस्तक से हटाया गया है...
- रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। - तो मध्य प्रदेश के बच्चे सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध कविता झांसी का रानी में इस लाइन ''अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी'' को नहीं पढ़ेंगे क्योंकि वहां की सरकार ने इसे हटवा दिया है. सोचिए, कितने नीच लोग हैं. अगर कविता पसंद नहीं है तो पूरा का पूरा हटा दो. या पसंद है तो पूरा का पूरा लगा लो. ये क्या कि उसमें छेड़छाड़ कर देंगे. यह घोर अपराध है और इसके लिए शिवराज सरकार की निंदा का जानी चाहिए. जनसत्ता को यह खबर छापने के लिए बधाई. अब आप सुभद्रा कुमारी चौहान लिखिति झांसी का रानी कविता का पूरा पाठ कीजिए... और सिंधियाओं के साथ साथ शिवराजों पर भी थू थू करिए...
- यशवंत
- एडिटर, भड़ास4मीडिया
- yashwant@bhadas4media.com
झांसी की रानी
- -सुभद्राकुमारी चौहान-
- सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। - चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। - कानपुर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी। - वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। - लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़| - महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। - हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी थी झांसी में, - चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। - उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई। - निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। - बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया। - अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। - अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया। - रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। - छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात?
जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात। - बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। - रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'। - यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। - कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान। - हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। - महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी, - जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। - इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम। - लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। - इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में। - ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। - रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार। - अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। - विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी। - पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। - तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार। - घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। - रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी, - दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। - जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी। - तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। - साभार-भड़ास4मीडिया
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Wednesday, July 06, 2011
सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता से वह एक लाइन हटवा दी है जिससे सिंधिया राजघराने के अंग्रेजों के मित्र होने का पता चलता है,
Thursday, May 12, 2011
शुक्रवार से अखबारों की समीक्षा
संचालक-आई4मीडिया
"कलयुग' का कल्कि अवतार
मृणाल पाण्डे, लेखिका जानी-मानी साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार हैं।
दाग अच्छे नहीं होते
असत्यापित टेपों ने बहस का ऐसा मुद्दा बना दिया कि अन्ना आंदोलन का असली मुद्दा पीछे रह गया। साबुन के विज्ञापन झूठ कहते हैं। दाग अच्छे नहीं होते। बेबुनियाद दाग तो कभी नहीं। युग इतनी तेजी से बदल रहा है कि मीडिया के संदर्भ में बदलाव शब्द अपने पुराने मायने खो चला है। पिछली सदी के पहले साठ बरसों में खबरिया जगत में प्रिंट मीडिया की भव्य बादशाहत कायम रही। फिर ट्रांसमीटरों और फिर जमीनी केबलों से घरों तक खबरें और मनोरंजन परोसने वाला टीवी सैटेलाइट से जुड़कर मीडिया का नया आकाशोन्मुखी नेता बन गया। न बे के दशक में इराकी हमले के दौरान अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन ने हजारों मील दूर अटलांटा से इराक युद्ध का चमत्कारी लाइव कवरेज दुनिया भर तक बीम करते हुए जिस नई ग्लोबल सूचना संचार व्यवस्था का ध्वजारोहण कराया, उसकी मदद से लोग दिन या रात को जब जी चाहे 24 & 7 छोटे पर्दे पर ताजातरीन खबरों का पीछा कर सकते थे। पेंटागन के निर्देश में सुदूर इराक पर सफलतापूर्वक दागी जा रही पेंटागन की मिसाइलों की छवियों ने अमेरिका से एशिया तक प्रिंट मीडिया का एकछत्र वर्चस्व खत्म कराया और बीबीसी सरीखे धाकड़ प िलक ब्रॉडकास्टर तक को खमठोंक चुनौती दे दी। भारत में जब उपग्रह से दुनियाभर की ताजा खबरें चौबीसों घंटे हवा के घोड़े पर सवार हो आने लगीं तो रात को छपकर सुबह बंटने वाले अखबारों से हमारे ग्राहकों को भी बासी गंध आने लगी। केबल युग की धमाकेदार शुरुआत के बाद तेजी से खबरिया टीवी के लोकप्रिय भाषायी संस्करण बन गए। बीस सालों से भी कम समय में केबल टीवी ने मीडिया की हर विधा में खबरों की भाषा, चित्रों की प्रस्तुति, खबरों का तर्जे बयां और उन पर बहस के तरीके बदल दिए और खबरों के संकलन से लेकर उन पर सार्वजनिक बहस के मंचों तक जनभागीदारी बढ़ाई। टैगोर ने सदी पहले कह दिया था कि कलियुग नहीं, एक कलयुग आ रहा है, जिसका कल्कि अवतार घोड़े की बजाय कल (यानी मशीनों) पर सवारी करते हुए आसमान से उतरेगा। सचमुच, उपग्रह से वायु तरंगों पर सवार होकर नया कलयुगी मल्टीमीडिया खबरों की दुनिया में जब से अवतरित हुआ है, उसने टीवी के साम्राज्य पर वैसा ही हल्ला बोल दिया है, जैसा कभी युवा टीवी ने बुढ़ाते प्रिंट मीडिया पर बोला था। युवा पीढ़ी नवीन मल्टीमीडिया टीवी का असली हरावल दस्ता है। ऊर्जामय और निरंतर हलचलभरी जिंदगी के प्रेमी शहरी युवाओं को लंबे-चौड़े अखबार जितना उबाते हैं, उतना ही चटपटी छोटी खबरों को कहीं भी, कभी भी पकड़ सकने वाले लैपटॉप, आईपैड और थ्रीजी मोबाइल के मल्टीपरपज मॉडल उनको मोहते हैं। वे कमरे में सोफे पर बैठे-बैठे टीवी भी यों देखें? उन्नत, सस्ते और यूजर फ्रेंडली लैपटॉप और थ्रीजी मोबाइल बातून युवा बहुल एशिया को ज्यों ही उपल ध हुए, वे टीवी या अखबारों को हमारे यहां भी वैसे ही अप्रासंगिक बना देंगे, जैसा मोबाइल ने फोन की लैंडलाइनों को बना डाला है। फेसबुक और ट्विटर सरीखी सोशल नेटवर्किंग साइट्स नेट पर उतरते ही दुनियाभर के युवाओं को आपस में जोड़ चुकी हैं और इस सोशल मीडिया के मार्फत युवा पीढ़ी ने मनोरंजन व खबरों की दुनिया के साथ अपना एक सीधा नया रिश्ता बना लिया है। अब उनकी खुद की भूमिका खबरों के निष्क्रिय पाठक या दर्शक या श्रोता के बजाय उनमें एक सक्रिय आक्रामक भागीदार की है। आज फेसबुक के करोड़ों सदस्य हैं और इसका दूसरा बिरादर ट्विटर भी उतना ही लोकप्रिय है, क्योंकि वह शाहरुख से शशि थरूर तक हर अभिनेता या नेता, मंत्री या संतरी को आपस में तुरंत जानकारी साझी करने और संक्षिह्रश्वत निजी राय प्रसारित करने का मौका दे रहा है। इस नई तरह की लोकतांत्रिकता का असर है कि साल के शुरुआती तीन महीनों में ही (ट्विटर पर) चीन से शुरू लोकतंत्र समर्थक 'चमेली क्रांतिÓ (जैस्मीन रिवोल्यूशन) की सुगंध ने चंद दिनों में पूरे मध्य एशिया में फैलकर वहां दशकों से स ाा पर काबिज होस्नी मुबारक और गद्दाफी सरीखे ताकतवर तानाशाहों का इंद्रासन भी हिला दिया। इसके असर का ताजा सबूत ओसामा के घर पर किए गए हमले और उसकी हत्या की सचित्र खबरें फेसबुक पर फटाफट दिखाना है, जिसने प्रिंट-टीवी के अनुभवी व खुर्राट मुगलों को एक और पटखनी दे दी है।
न्यूयॉर्क टाइ स के अनुसार ओसामा की मौत की पुष्टि होते ही सभी बड़े अमेरिकी अखबारों और टीवी चैनलों को सरकारी ब्रीफिंग दे दी गई थी। पर उन सभी ने राष्ट्रपति ओबामा द्वारा खबर के औपचारिक (राष्ट्र के नाम संदेश के तहत) प्रसारण के बाद ही इसे देने के सरकारी अनुरोध का मान रखा। सोशल मीडिया निकला बेलगाम कल्कि अवतार। सिर्फ कयास के आधार पर रात 10:45 पर एबटाबाद के एक व्यक्ति ने अमेरिकी हमले और ओसामा के मारे जाने की खबर फेसबुक पर डाल दी। ओबामा द्वारा विधिवत घोषणा से दो घंटे पहले ही यह खबर दुनिया
भर में पहुंच चुकी थी और करोड़ों मोबाइल घनघनाने लगे थे। ट्विटर पर भी यह टीवी के लाइव प्रसारण से 20 मिनट पहले आ चुकी थी। खबर जगत को नौसिखिये और अ सर सीमित मानसिक क्षितिज वाले स्वयंभू संवाददाताओं की बढ़ती क्षमता और संगीन जटिल मामलों की सनसनीखेज और गैरजि मेदाराना रिपोर्टिंग से सावधान रहने की भी जरूरत है। मल्टीमीडिया लोकतंत्र की रक्षा के लिए तलवार जरूर है, पर अनुभवहीन मूर्खों या चतुर तानाशाहों और गलत सूचनाएं देने के खेल में माहिर आतंकी धड़ों के हाथों में यह बंदर के हाथ का उस्तरा भी
बन सकता है। मल्टीमीडिया का विकास इतनी तेजी से हुआ है कि अब तक साइबर कानूनों के विशेषज्ञ भी सोशल मीडिया की वे स्वस्थ सीमाएं और नियम नहीं तय कर सके हैं, जो पारंपरिक मीडिया को लक्ष्मण रेखा
के भीतर रखते हैं। पु ता सबूत के बिना, अदालती कार्यवाही पूरी होने से पहले कई बार किसी इज्जतदार व्यक्ति का पक्ष सुने बिना ही उसको नया मीडिया अभियु त करार दे देता है। हर किसी को लोकतंत्र में सुने जाने का हक है, जरूर है, पर दूसरे के इस हक का छिछोरेपन से किया गया उल्लंघन उनको अपूरणीय क्षति भी पहुंचा सकता है। इसका शर्मनाक उदाहरण हमने अभी अन्ना के साथियों के बारे में अचानक अनजान स्रोतों से जारी कर दिए गए उन असत्यापित टेपों के असर में देखा है, जिनको बहस का ऐसा मुद्दा बना दिया गया कि आंदोलन का असली
मुद्दा पीछे रह गया। साबुन के विज्ञापन झूठ कहते हैं। दाग अच्छे नहीं होते। बेबुनियाद दाग तो कभी नहीं।
Wednesday, May 11, 2011
एक में से पांच युवतियां निकली और बन गया गूगल
Sunday, May 08, 2011
पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे कलाम के हाथो ‘भोजपुरी सिनेमा के पचास साल किताब’ का विमोचन
Editor
www.mediaclubofindia.com
www.purvanchalexpress.com
Monday, May 02, 2011
Thursday, April 29, 2010
ये तो कुछ भी नहीं.....
भोपाल। जबलपुर से एक रिपोर्ट भड़ास4 media par प्रकाशित हुई है की जबलपुर के कलेक्टर ने पत्रकारों को अपमानित करने वाली टिप्पणी की है. यु तो मामला गंभीर है लेकिन मध्य प्रदेश की पूरी स्थिति देखें तो हर दिन एक वाकया मिल जायेगा। ये तो कमिश्नर हैं, यहाँ के तो एसडीएम भी सवाल पसंद नहीं आने पर नए पत्रकारों से कह देते हैं की पहले सवाल करना सीख लो। इतना ही नहीं दैनिक भास्कर भोपाल के फोटो जर्नलिस्ट ने जब कुछ किसानों के साथ जाकर उनकी समस्या ओबेदुल्लागंज ब्लाक( ये मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में) के एसडीएम संजय सिंह के सामने रखी तो उन्होंने फोटो जर्नलिस्ट को दलाल कह दिया। इस टिप्पणी का मकसद किसी को आहत करना कतई नहीं है, लेकिन मध्य प्रदेश में पत्रकारों के अपमान की बानगी जरुर है।
ये है वो खबर
पत्रकारों से बोले कमिश्नर- चुल्लू भर पानी में डूब मरो
पत्रकारों के सवालों से झल्लाए जबलपुर के कलेक्टर ने पत्रकारों को चुल्लू भर पानी में डूब मरने की नसीहत दे डाली. उन्होंने ये बात उस समय कही जब पत्रकार शहडोल संभाग के कमिश्नर हीरालाल त्रिवेदी से उनकी नयी कार के बारे में पूछ रहे थे. मामला उस समय हुआ जब मध्यप्रदेश के वित्त मंत्री राघव जी जबलपुर में जबलपुर, शहडोल और रीवा संभाग की समीक्षा बैठक लेने आये थे.इस समीक्षा बैठक में शहडोल संभाग के कमिश्नर हीरालाल त्रिवेदी बिना नंबर की लक्जरी फोर्ड इन्डिवर वाहन में जबलपुर आये थे. जब ये बात पत्रकारों को पता चली तो उन्होंने वित्त मंत्री के जाते ही कमिश्नर साहब को घेर लिया और उनसे इस लक्जरी फोर्ड इन्डिवर वाहन के बारे में सवाल दाग दिए. कमिश्नर साहब अपना बचाव करते हुए कहने लगे की सरकार ने ये सुविधा राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत कलेक्टर और कमिश्नर को प्रदान की है. इसी कारण इस सुविधा का लाभ हम उठा रहे हैं. ये बात जबलपुर कलेक्टर गुलशन बामरा को ठीक नहीं लगी और उन्होंने पत्रकारों को नसीहत देते हुए कहा की इस तरह के सवाल आप लोगों को यहां नहीं करने चाहिए. कमिश्नर साहब हमारे मेहमान है और उनसे इस तरह के आप लोग सवाल कर रहे हैं. आप लोगों को तो चुल्लू भर पानी में डूब जाना चाहिए.
अब साहब, कमिश्नर साहब आपके मेहमान हैं, और पत्रकार उनसे सवाल पूछ रहे हैं, और उन्हें इसका जवाब देने में कोई दिक्कत नहीं हो रही है, तो आपको ख़राब बिल्कुल नहीं लगना चाहिए.
इधर शहडोल कमिश्नर हीरालाल त्रिवेदी ने ये भी कहा कि सरकार ने 15 हज़ार रुपये किराये पर कोई भी वाहन लेने के लिए कहा है. लेकिन अब सवाल उठता है कि क्या 15 हज़ार रुपये में लक्जरी फोर्ड इन्डिवर वाहन किराये पर मिल सकता है. क्योंकि इस वाहन का एवरेज ही 6-8 प्रति किलोमीटर है. प्रदेश के वित्त मंत्री राघव का कहना है कि प्रदेश पर बहुत ढेर सारा कर्ज का बोझ है पर कमिश्नर साहब लक्जरी कार में घूम रहे हैं.
जबलपुर से आशीष विश्वकर्मा की रिपोर्ट
साभार-bhadas4media


