Wednesday, April 01, 2009

कहाँ जायेगी ये लडाई

पत्रकार जगत में कुछ स्तम्भ ऐसे हैं जिनको हमेशा आदर्श से देखा जाता है। लेकिन जब बड़े और नामी पत्रकार खुलकर मैदान में आने लगे तो शायद नवागंतुक पत्रकारों के सामने भ्रम और चिंता की स्थिति निर्मित हो जाती है। कुछ एसा ही हो रहा है।
मृणाल पांडेय और वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की कलम बजाय सिस्टम के खिलाफ आग उगलने के एक-दूसरे के खिलाफ चल रही है। केसे आप ख़ुद देखिये, भड़ास4मीडिया के सहयोग से।


बदलती अखबारी दुनिया और पत्रकारिता की चुनौतियां
-मृणाल पांडेय
विश्वव्यापी मंदी ने जिन कई संस्थानों की चूलें बुरी तरह से हिला डाली हैं, अखबार जगत उनमें से एक है। और व्यापक मंदी की मार विकासशील देशों के छोटे-छोटे अखबारों पर ही नहीं, दि न्यूयॉर्क टाइम्स, बोस्टन ग्लोब तथा लॉस एंजेलीस टाइम्स जैसे अमेरिकी अखबारों पर भी पड़ी है। दो बड़े अखबारों-शिकागो ट्रिब्यून तथा लॉस एंजेलीस टाइम्स छापने वाले संस्थान (दि ट्रिब्यून कं.) ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया है। खर्चा घटाने को न्यूजर्सी के सबसे बड़े अखबार ने अपने आधे स्टाफ की छंटनी कर डाली है, और बाल्टीमोर सन तथा बोस्टन ग्लोब ने विदेशों से अपने संवाद-ब्यूरो हटा लिए हैं। बाजार में न्यूयार्क टाइम्स की कीमत पहले की दशमांश रह गई है, और तमाम कटौतियों के बाद भी वह मेक्सिको के एक बड़े उद्योगपति से लोन मांगने को मजबूर हुआ है, ताकि रोजाना का कामकाज चलता रहे।
कहने को कहा जा सकता है कि इंटरनेट, सर्च इंजिनों तथा ब्लॉग साइट्स के युग में मीडिया का कलेवर अब बदलेगा ही। और आज नहीं तो कल हिंदी पट्टी में भी लोगबाग नेट तथा केबल पर ही अखबार पढ़ेंगे। लेकिन क्या आप जानते हें कि आज भी इंटरनेट पर 85 प्रतिशत खबरों का स्रोत प्रिंट मीडिया ही है। वजह यह, कि सर्च इंजिन गूगल हो अथवा याहू, दुनियाभर में अपने मंजे हुए संवाददाताओं की बड़ी फौज तैनात करने की दिशा में अभी किसी इंटरनेट स्रोत ने खर्चा नहीं किया है। और वह करे भी, तो रातोंरात अखबार के कुशल पत्रकारों जैसी टीम वह खड़ी नहीं कर सकेंगे। बड़े अखबारों और वरिष्ठ संवाददाताओं से पाठक, नागरिक संगठन या सरकारें भले ही कई मुद्दों पर मतभेद रखें, इसमें शक नहीं कि युद्ध से लेकर बैंकिंग तक के घोटालों, रोमानिया तथा भारत से लेकर श्रीलंका तक में अलोकतांत्रिक घटनाओं तथा लोकतांत्रिक चुनावों और पर्यावरण तथा खाद्यसुरक्षा स्थिति की बाबत जन-जन तक बारीक जानकारियां पहुंचा कर मानवहित में विश्वव्यापी जनसमर्थन जुटाने का जो काम बड़े अखबारों के संवाददाताओं ने दुनियाभर में किया है, उसके बिना आज दुनिया में लोकतंत्र और मानवाधिकार काफी हद तक मिट चुके होते।
कई लोगों का मानना है कि अखबारों के खासकर भारत के अंग्रेजी अखबारों के क्षय की बड़ी वजह पाठकों की गिरती तादाद है। लेकिन यह पूरी तरह सच नहीं। आज भी अच्छे अखबारों के पाठकों की संख्या कोई कम नहीं, खासकर भारतीय भाषाओं में। लेकिन दिक्कत यह है, कि पाठकों को सबसे सस्ता अखबार देने की होड़ में अखबार दामी विज्ञापनों के बूते अपनी असली लागत से कहीं कम (लगभग 1/10वीं) कीमत पर बेचे जाते रहे हैं। और इधर बाजार की मंदी के कारण वह विज्ञापनी प्राणवायु लगातार घटती जा रही है। अब अगर अखबार अपनी असली लागत पर बेचे जाने लगे, तो उसके पाठक निश्चिय ही घटने लगेंगे। खबरिया चैनल तथा ब्लॉग एक हद तक खबरों या गॉसिप की भूख मिटा सकते हैं, लेकिन चैनलों की तुलना में अखबारों की कवरेज बहुआयामी होती है। उसमें सिर्फ स्टोरी ही नहीं, उसका वरिष्ठ संवाददाताओं तथा संपादकों द्वारा बाकायदा विश्लेषण और उसकी अदृश्य पृष्ठभूमि से जुड़े तमाम तरह के ब्योरे और जानकारियां भी मौजूद होते हैं। इंटरनेट की भाषायी पाठकों तक अभी वैसी पहुंच भी नहीं बनी है, जैसी कि अंग्रेजी पाठकों की। लेकिन इन दिनों बदलाव की जो हवा नई तकनीकी के साथ बह रही है, उसने मोबाइल तथा केबल टी.वी. के जरिए हिन्दी पट्टी में सूचना क्षेत्र में अपनी भारी उपस्थिति तो दर्ज करा ही दी है।
यह एक विडंबना ही है, कि जिस वक्त दुनिया के अनेक महत्वपूर्ण अखबारों के जनक और वरिष्ठ पत्रकार, इंटरनेट और अभूतपूर्व आर्थिक मंदी की दोहरी चुनौतियों से जूझते हुए नई राहें खोज रहे हैं, वहीं हमारे देश में (संभवत: पहली बार) लहलहा चले ज्यादातर भाषाई अखबारों को यह गलतफहमी हो गई है, कि लोकतंत्र का यह गोवर्धन जो है, उन्हीं की कानी उंगली पर टिका हुआ है। इसलिए वे कानून से भी ऊपर हैं। ऊपरी तौर से इस भ्रांति की कुछ वजहें हैं। क्योंकि हर जगह से हताश और निराश अनेक नागरिक आज स्वत: स्फूर्त ढंग से मीडिया की शरण में उमड़े चले जा रहे हैं। और यह भी सही है, कि हमारे यहां अनेक बड़े घोटालों तथा अपराधों का उदघाटन भी मीडिया ने ही किया है। लेकिन ईमान से देखें तो अपनी व्यापक प्रसार संख्या के बावजूद भाषायी पत्रकारिता का अपना योगदान इन दोनों ही क्षेत्रों में बेहद नगण्य है। दूसरी तरफ ऐसे तमाम उदाहरण आपको वहां मिल जाएंगे, जहां हिन्दी पत्रकारों ने छोटे-बड़े शहरों में मीडिया में खबर देने या छिपाने की अपनी शक्ति के बूते एक माफियानुमा दबदबा बना लिया है। और पैसा या प्रभाववलय पाने को वे अपनी खबरों में पानी मिला रहे हैं। सरकारी नियुक्तियां, तबादलों और प्रोन्नतियों में बिचौलिया बनकर गरीबों से पैसे भी वे कई जगह वसूल रहे हैं, और भ्रष्ट सत्तारूढ़ मुफ्त में नेताओं को ओबलाइज करके उनसे सस्ते या जमीनी और खदानी पट्टे हासिल कर रहे हैं, इसके भी कई चर्चे हैं। चूंकि एक मछली भी पूरे तालाब को गंदा कर सकती है, हिन्दी में कई अच्छे पत्र और पत्रकारों की उपस्थिति के बावजूद हमारे यहां आम जनता के बीच भाषायी पत्रकारों का नाम बार-बार अप्रिय विवादों में उछलने से अब उनकी औसत छवि बहुत उज्ज्वल या आदरयोग्य नहीं है।
इधर इंटरनेट पर कुछेक विवादास्पद पत्रकारों ने ब्लाग जगत की राह जा पकड़ी है, जहां वे जिहादियों की मुद्रा में रोज कीचड़ उछालने वाली ढेरों गैर-जिम्मेदार और अपुष्ट खबरें छाप कर भाषायी पत्रकारिता की नकारात्मक छवि को और भी आगे बढ़ा रहे हैं। ऊंचे पद पर बैठे वे वरिष्ठ पत्रकार या नागरिक उनके प्रिय शिकार हैं, जिन पर हमला बोल कर वे अपने क्षुद्र अहं को तो तुष्ट करते ही हैं, दूसरी ओर पाठकों के आगे सीना ठोंक कर कहते हैं कि उन्होंने खोजी पत्रकार होने के नाते निडरता से बड़े-बड़ों पर हल्ला बोल दिया है। यहां जिन पर लगातार अनर्गल आक्षेप लगाए जा रहे हों, वे दुविधा से भर जोते हैं, कि वे इस इकतरफा स्थिति का क्या करें? क्या घटिया स्तर के आधारहीन तथ्यों पर लंबे प्रतिवाद जारी करना जरूरी या शोभनीय होगा? पर प्रतिकार न किया, तो शालीन मौन के और भी ऊलजलूल अर्थ निकाले तथा प्रचारित किए जाएंगे।
अभी हाल में एक ब्लॉग ने एक महत्वपूर्ण अंग्रेजी खबरिया चैनल की वरिष्ठ महिलाकर्मी के बारे में बेहद आपत्तिजनक भाषा ओर अपुष्ट तथ्यों के बूते एक मुहिम छेड़ दी थी। चैनल ने कानून की मदद से उसको अपनी उसी साइट पर अपनी गलती स्वीकार करने और माफी मांगने पर बाध्य किया। एक अच्छे स्थापित पेशेवर व्यकित के लिए अपनी साख पर झूठा बट्टा लगाया जाना, शारीरिक उत्पीड़न से कहीं अधिक यंत्रणादायक हो सकता है। कोई दुर्भावनावश उसकी लगातार यश-हत्या करता रहे, और पकड़े जाने पर अपनी क्षुद्रता या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला देकर आत्मरक्षात्मक तेवर अख्तियार करे, तो क्या उसे हंस कर बरी कर दिया जाए, ताकि वह और भी साखदार लोगों की पगड़ी उछालता फिरे? ऐसे क्षणों में हमारा पत्रकार जगत प्राय: अपने लिए किसी आचरण संहिता और अवमानना के दोषी सहकर्मियों पर सख्त कानूनी व्यवस्था का विरोध करता है। पर अगर प्रोफेशनल दुराचरण साबित होने पर एक डॉक्टर या चार्टर्ड अकाउंटेंट नप सकता है, तो एक गैरजिम्मेदार पत्रकार क्यों नहीं? हमारी राय में मीडिया की छवि बिगाड़ने वाली इस तरह की गैर-जिम्मेदार घटिया पत्रकारिता के खिलाफ ईमानदार और पेशे का आदर करने वाले पत्रकारों का भी आंदोलित होना आवश्यक बन गया है, क्योंकि इसके मूल में किसी पेशे की प्रताड़ना नहीं, पत्रकारिता को एक नाजुक वक्त में सही, धंधई पटरी पर लाने की स्वस्थ इच्छा है।

जवाब हम देंगे
संजय कुमार सिंह
स्ट्रिंगरों का माफियानुमा दबदबा और मृणाल जी की हिटलरी !!
दैनिक हिंदुस्तान की प्रमुख संपादक मृणाल पांडेय का संपादकीय लेख पढ़कर ही लगा था कि इसका जवाब लिखना बेहद जरूरी है। मैंने लिखकर रोजी रोटी चलाने की कोशिश की थी पर मामला जमा नहीं और मुफ्त में लिखने का शौक या छपास रोग रहा नहीं। इसलिए लिखना हो नहीं पाया। पर भड़ास4मीडिया के यशवंत सिंह ने मानो चुनौती दी है कि मृणाल पांडेय को जवाब देना बहुत मुश्किल है।
(जानता हूं कोई तीर नहीं मारने जा रहा पर मृणाल जी ने मधुमक्खी के छत्ते पर पत्थर मारा है तो जितना संभव और मौका है, काट-बकोट लूं। उन्होंने तो जो करना था सो कर ही लिया है)। मृणाल जी को मैंने पहले कभी नहीं पढ़ा है क्योंकि फिक्शन में मेरी दिलचस्पी नहीं रही। मृणाल पांडेय ने एनडीटीवी से नौकरी छोड़ने के बाद वहां के हालात पर एक फिक्शन लिखा था। फिक्शन इसलिए क्योंकि सच को साफ-साफ कहने-लिखने का साहस उनमें न था। इसलिए सारी बातें अमूर्तता और इशारों-इशारों से कहने की कोशिश की। एक और चीज है, लिखे से कमाई भी हो जाती है इसलिए लिखना छोड़ा भी नहीं जा सकता। और लिखने के लिए कुछ न कुछ लिखना है तो उन्होंने यह लेख भी दे मारा। सच को फिक्शन की शक्ल में लिखकर खुद मानहानि से बचने का रास्ता अपना चुकी मृणालजी को सच कहने वाले पसंद नहीं हैं, तभी तो उन्होंने अपने लेख में विश्वव्यापी मंदी से शुरू करके बदलती अखबारी दुनिया और पत्रकारिता की चुनौतियां विषय पर लेख लिखकर उन्होंने वही किया है जो उनके शब्दों में, ..कुछेक विवादास्पद पत्रकारों ने ब्लॉग जगत की राह पकड़कर ... और अपुष्ट खबरें छापकर .... किया है।
मृणाल पांडे को विश्वव्यापी मंदी और इस कारण दुनिया भर के अखबारों की हुई दुर्दशा की चिन्ता के साथ-साथ इस बात की भी चिन्ता है कि हिन्दी पत्रकार रूपी एक मछली भी पूरे तालाब को गंदा कर सकती है और उन्होंने बताया है कि हमारे यहां आम जनता के बीच भाषायी पत्रकारों की छवि बहुत उज्ज्वल या आदर योग्य नहीं है। पर वे यह नहीं बतातीं कि इसे ठीक करने के लिए वे क्या कर रही हैं या क्या किया है। बहुत ही चलताऊ अंदाज में उन्होंने हिन्दी पत्रकारों को कोसा है पर इससे भाषायी पत्रकारिता की नकारात्मक छवि कैसे ठीक होगी, यह नहीं समझ आ रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स को रोजाना के कामकाज चलाने के लिए कर्ज लेना पड़ा, यह तो उन्होंने बताया है पर यह नहीं बताया कि हिन्दुस्तान से बेरोजगार हुए लोग को कर्ज भी मिल पा रहा है कि नहीं।
विवादास्पद पत्रकारों (में से एक) ने अगर अपने ब्लॉग पर (जिसका नाम ही गॉशिप अड्डा है) यह लिख दिया कि हिन्दुस्तान समूह के मालिक के निधन के बावजूद लखनऊ में पार्टी मनी या हिन्दुस्तान टाइम्स ने उनकी जगह किसी और की फोटो छाप दी तो इसमें गलत क्या है। इससे भाषायी पत्रकारिता की नकारात्मक छवि भी कहां आगे बढ़ पाई। यह महानता तो अंग्रेजी के अखबार की थी। इसी तरह शैलबाला मामले की सूचना देकर भड़ास4मीडिया ने क्या गलत किया। उसने तो उस सपने की खबर भी दी जो हिन्दुस्तान वालों को पहले ही आ गई थी कि शैलबाला नौकरी से निकाले जाने के बाद धकियाई जाएंगी और धकियाने वालों के खिलाफ थाने जाएंगी
इसी तरह, रचना वर्मा ने अगर आपकी दी सलाह - परेशानी है तो नौकरी छोड़ दो, को सार्वजनिक करके भाषायी पत्रकारिता की नकारात्मक छवि को आगे बढ़ाया है तो इसका श्रेय आपको ही है। आपने अंग्रेजी की एक महिला टीवी पत्रकार के खिलाफ ब्लॉग पर आपत्तिजनक भाषा में अभियान चलाने के मामले का जिक्र किया है। संबंधित पत्रकार और उसके संस्थान ने उससे माफी मंगवा ली, उसने पोस्ट हटा ली। उसकी थू-थू हो गई। बाकियों को सीख भी मिल गई होगी। अब क्या आप उसकी जान लेंगी। इस मामले का हवाला देकर आप क्या कहना चाहती हैं। इसे कोई भी सही नहीं कहेगा और किसी को ऐसी आजादी नहीं चाहिए। लेकिन किसी एक ब्लॉगर ने ऐसा किया इसलिए ब्लॉगिंग ही बंद कराने की आपकी इच्छा खतरनाक है।
अगर उमेश जोशी ने लिखा है कि प्रभाष जोशी की भाषा से उनके दंभ, क्रूरता और रागद्वेष का पता चलता है तो क्या यह कोई नई बात है। और अगर प्रभाष जोशी ने इसका प्रतिकार नहीं किया तो क्या उनके शालीन मौन के ऊल जलूल अर्थ निकाले जा सकते हैं। मृणाल पांडेय ऐसा मानती हों तो मानें पर उनसे सहमत होने का कोई कारण नहीं है। दूसरी ओर, संपादक पत्रकार जब सार्वजनिक जीवन जीने वालों की निजी जिन्दगी में झांकते और झांकने का अधिकार व आजादी चाहते हैं तो क्या संपादकों को इसके लिए खुद तैयार नहीं होना चाहिए।
आप अपने लिखे से अपनी जो छवि बनाती हैं उसके आधार पर कितने युवा लोग पत्रकार बनने का फैसला करते हैं, आपके मातहत आपके साथ काम करने के लिए लालायित रहते हैं और कई बार जब उन्हें आपके मातहत आकर पता चलता है कि असल में आप वो नहीं हैं जो लबादा आपने पहन रखा है तो उनके मन पर क्या बीतती है, उनके दिल-दिमाग में क्या होता है, इसकी कल्पना कभी की है आपने। प्रभाष जोशी को महान पत्रकार मानकर कितने ही लोग पत्रकार बन गए। अपने कैरियर के संबंध में महत्त्वपूर्ण निर्णय कर लिया पर समय निकल जाने के बाद उनकी यह राय मालूम हुई कि ज्यादा पैसे देने से कोई अच्छा शीर्षक नहीं लगा सकता या अच्छी कविता नहीं लिख सकता। यह उनकी राय है। सार्वजनिक है। इस राय के लिए उन्हें अच्छा संपादक कहा जा सकता है पर यह भी सच है कि पैसे ठीक न मिलें तो अच्छा शीर्षक लगाने वाला शीर्षक लगाता ही रहेगा, यह जरूरी नहीं है।
इसलिए आप यानी ऊंचे पद पर बैठे वरिष्ठ पत्रकार या नागरिक कैसे हैं, यह जानना उनका हक है जो ऐसे लोगों के प्रशंसक हैं और अगर कोई यह काम कर रहा है तो उसके खिलाफ मानहानि कानून और सत्ता, शक्ति का उपयोग करके आप कोई महानता नहीं कर रही हैं। भाषायी पत्रकारिता की नकारात्मक छवि को आगे बढ़ने से रोकने के लिए मानहानि कानून का सहारा लेने की बजाय निन्दक नियरे राखिए आंगन कुटि छवाय में विश्वास कीजिए - सबका भला होगा। अगर आपमें पत्रकारिता को धंधई पटरी पर लाने की स्वस्थ इच्छा वाकई है तो उन घोटालों और गड़बड़ियों पर भी नजर डालिए जो मालिकान कर रहे हैं और कुछेक संपादक भी। मुफ्त में काम करने वाले स्ट्रिंगरों को कैसे रखा और हटाया जाता है, सब जानते हैं। ऐसे में वे क्या माफियानुमा दबदबा बनाएंगे और क्या पानी मिलाएंगे। वैसे भी, बेचारे तो जरा सा ही दूध बेच पाते हैं उसमें कितना पानी मिला लेंगे। उनकी चिन्ता छोड़िए।

अब इन दोनों लेख के बाद कौन तय करेगा की कौन सही है और कौन ग़लत है?

Monday, February 09, 2009

फिर पिटा फोटोग्राफर

मीडिया नहीं दे सका खुलकर साथ, फोटोग्राफर पर हमला करने वाले वकीलों के खिलाफ नहीं हुई कार्रवाई
उज्‍जैन। अभी पांच दिन ही बीत हैं जब बीबीसी की एक खबर ने भारत के पत्रकारों और के साथ दुनिया भर में पत्रकारिता के पेशे से जुड़े लोगों को चिंता में डाल दिया था। उस रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में पत्रकारों और फोटोग्राफरों पर हमले के मामले में 2008 में पाकिस्तान दूसरे और भारत तीसरे नंबर पर रहा है। जबकि इराक नंबर वन के पायदान पर रहा है। तो रही बीबीसी की रिपोर्ट, लेकिन ये रिपोर्ट तब सच जान पढती है जब प्रदेश के नंबर एक अखबार के एक फोटोग्राफर शाहिद खान के उपर भरी अदालत में वकीलों द्वारा हमला किया जाता है। ये वही शाहिद खान हैं जो संवेदनशील स्थिति में फोटो खींचकर लाते हैं और सुबह लोग उनके फोटो देख अपने दिन की शुरूआत करते हैं। इनकी पिटाई होने के बाद स्‍‍थानीय अखबारों में बडी-बडी खबरें प्रकाशित हुई मगर वकीलों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई।
जिन अखबारों में खबरें प्रकाशित हुई उनमें दैनिक भास्‍‍कर, सांध्‍‍‍यदैनिक अग्निबाण, दैनिक अवंतिका, दैनिक अग्निपथ और राज एक्‍सप्रेस शामिल हैं। लेकिन शाहिद खान के लिए मीडिया ने बहुत
ज्‍‍यादा हंगामा मीडिया कर्मियों ने किया हो ऐसा कहीं दिखाई नहीं दिया। ये घटना है 3 फरवरी को दोपहर साढे 12 बजे की जिस पूरे मध्‍यप्रदेश में वकीलों धारा दं‍ड विधान(सीआरपीसी) की धाराओं में संशोधन को लेकर एसोसिएशन ने कलमबंद हडताल की थी और सभी वकील कोठी पैलेस गए हुए थे। उनके पहले अपने दायित्‍व को ध्‍यान में रखकर उज्‍जैन के सभी पत्रकार और प्रेस फोटोग्राफर कोठी पैलेस पहले ही पहुंच गए थे। इसी दौरान एक वकील ने शाहिद से कहा कि हमारा भी फोटो भी खींच लिया करो तो उसके जबाव में शाहिद ने कहा कि आप भी नेता बन जाए तो हम फोटो खींच लेंगे। बस इतना कहना शाहिद को भारी पड गया और शाहिद और मनोज में विवाद हो गया। विवाद इतना बढा कि वकील शाहिद के साथ हाथापाई करने लगे। वहां मौजूद पत्रकारों ने उन्‍हें अलग किया। इसके बाद वकीलों ने शाहिद खान के खिलाफ भी एक आवेदन दिया और शाहिद को अदालत में घसीटने की धमकी दी। इस पूरे मामले में मीडिया कर्मियों ने शाहिद के पक्ष में जिस प्रकार खुलकर समर्थन करना चाहिए था,नहीं किया। आज शाहिद के सामने दिक्‍कत यह है कि वह अगर वकीलों से समझौता नहीं करता है तो वे उसे अदालत में ले जाने की बात करते हैं और और अगर वह ऐसा करता है तो यह स्‍वयं के प्रोफेशन के साथ्‍ा नाइंसाफी होगी। बीबीसी की रिपोर्ट हमें बताती है कि हम पाकिस्‍तान से पीछे नहीं है मनमानी करने में और यह घटना बताती है कि एक मीडिया कर्मी भी कितनी मुश्किलों में काम करता है।

Friday, February 06, 2009

पुलिस भई दादा,कोई नई केने वाला

12 साल के लड़के पर शांति भंग का मामला!
अभी छह वर्षीय बालिका को पुलिस द्वारा पीटने का मामला शांत भी नहीं हुआ था कि उत्तरप्रदेश के सहारनपुर जिले में पुलिस ने एक 12 वर्षीय बच्चे पर शांति भंग की धारा लगाकर एकबार फिर अपनी किरकिरी कराई है। अब इस मामले के लिए जिम्मेदार थाना प्रभारी को निलंबित कर दिया गया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि एक बाद एक ऐसी घटनाएं क्‍यों हो रही हैं। इस मामले में दो पक्ष सामने आ रहे हैं। एक पक्ष का कहना है कि पुलिस अगर कोई कार्रवाई कर रही है तो उसे मीडिया में इस प्रकार विलेन बनाकर अपमानित नहीं करना चाहिए। लेकिन दूसरे पक्ष का कहना है कि पुलिस को कोई अधिकार नहीं है कि वह बिना जांच के किसी के भी खिलाफ कोई प्रकरण दर्ज करे और वह भी बच्‍चों के मामले में तो बिल्‍कुल नहीं। यहां में कुछ ऐसे उदाहरण देना चाहुंगा जिससे दूसरे पक्ष की बातें सही लगती है।

प्रकरण क्‍यों दर्ज नहीं किया-भोपाल के दो अलग-अलग थानों में दो मामले आए जिनमें से पहला मामला था एक अनुसूचित जाति की महिला का। महिला एक सरकारी कार्यालय में अस्‍थायी पद पर काम करती थी लेकिन उसका अधिकारी उसे बहुत ज्‍यादा परेशान करता था। यहां तक की वह उस महिला को सार्वजनिक रूप से अपमानित भी कर चुका था। बहुत ज्‍यादा परेशान होने के बाद महिला ने अजाक थाना कोहेफिजा में शिकायत की और दो गवाह भी प्रस्‍तुत किए। लेकिन पुलिस वालों ने उसके सबूतों को नकारते हुए मामले में ढील बरती और शिकायत के दो माह बाद भी एफआईआर नहीं की। क्‍योंकि जिसके खिलाफ महिला ने उक्‍त आरोप लगाए थे वह एक अधिकारी है। तो सवाल यह उठता है कि क्‍या कोई अधिकारी है तो उसे अपराध करने का पूरा मौका मिल जाता ?

प्रकरण भी दर्ज किया और जेल भी भेज दिया-दूसरा मामला भोपाल के गांधीनगर थाने का है, जहां महेश नामक एक युवक के खिलाफ उसके ससुराल वालों ने थाने में शिकायत की। शिकायत में आरोप लगाए गए कि उनके दामाद महेश ने उनकी बेटी की दहेज के लिए हत्‍या कर दी इसलिए उसके खिलाफ दहेज हत्‍या और दहेज मांगने का प्रकरण दर्ज किया जाए। पुलिस ने मामले में आनन-फानन में महेश के खिलाफ प्रकरण दर्ज कर उसके अगले दिन उसे न्‍यायालय में पेश कर रिमांड पर ले लिया। जबकि महेश की पत्‍नी ने क्षेत्रीय नायब तहसीलदार को मरते समय बयान दिया था कि उस मौत की वजह वह स्‍वयं है और खाना बनाते समय स्‍वयं की गलती से वह झुलस गई। इसलिए उसके ससुराल वालों को परेशान न किया जाए। इस पूरे बयान को दरकिनार कर पुलिस ने महेश पर दादागिरी दिखाई क्‍योंकि वह ऐसा युवक था जो न तो पुलिस की मुठ़ठी गरम कर सकता था और न ही उसके पक्ष में कोई बोलने वाला था। इन दो उदाहरणों से पुलिस का दोगलापन साबित हो जाता है। शायद यही वजह रही कि उत्तरप्रदेश के सहारनपुर जिले में पुलिस ने एक 12 वर्षीय बच्चे पर शांति भंग की धारा लगाई। अफसोस बहुत अफसोस।

एक नजर में उत्‍तरप्रदेश का समस्‍त घटनाक्रम
पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) आरके. रघुवंशी ने शुक्रवार को मामले को संज्ञान में लेते हुए सरसावा थाना प्रभारी को निलंबित कर दिया गया है। बच्चे के खिलाफ लगाई गई धारा समाप्त करने की कार्रवाई की जा रही है। सरसावा थाना प्रभारी ने कुतुबपुर गांव के तहसीन नामक एक 12 वर्षीय बच्चे पर शांति भंग का आरोप लगाया और उसे दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा- 107/16 के तहत निरुद्ध कर दिया। इसके बाद मामले की रिपोर्ट उप जिलाधिकारी को भेज दी। उप जिलाधिकारी ने बच्चे के खिलाफ सम्मन जारी कर दिया। शुक्रवार को उप जिलाधिकारी के यहां न्याय की गुहार लगाने गए बच्चे के पिता नजरा ने संवाददाताओं को बताया कि पुलिस ने गलत तरीके से उनके बेटे को फंसाया है। नजरा ने कहा कि जब उनके घर सम्मन आया तो उन्हें पुलिस की इस कार्रवाई की जानकारी हुई। घटना के बाद से ही बच्चा सदमे में है। वह बहुत डरा हुआ है।

बच्‍ची को पीटने संबंधी खबर जानने के लिए पढे

पुलिस ने छह वर्षीय बच्ची को बेरहमी से पीटा

बालिका पिटाई: पुलिस महानिरीक्षक ने माफी मांगी

Thursday, February 05, 2009

उन्‍होंने नाकाबिल को काबिल बना दिया।

नया दिन होगा, नई रात होगी,
नए सिलसिले की शुरुआत होगी,
मुसाफिर हो तुम भी,
मुसाफिर हैं हम भी,
किसी मोड़ पर मुलाकात होगी।
ये लाइनें हैं मध्‍यप्रदेश में इलेक्‍टानिक पत्रकारिता को एक मुकाम देने वाले राजेश बादल की। उन्होंने हाल ही में भारी मन से वॉइस ऑफ इंडिया से इस्‍तीफा तो दे दिया, लेकिन हमेशा की तरह मन में साथियों के लिए जो भाव रहे उसको अभिव्‍यक्‍त नहीं कर पाए। नतीजतन दफ़तर छोडने से पहले उन्‍होंने सभी साथियों को ईमेल भेजकर दिल के गुबार को उसमें व्‍यक्‍त किए। उनके बारे में कुछ कहूं ऐसा मुझमें सामर्थ्‍य तो नहीं, लेकिन गुरु-शिष्‍य परंपरा को कैसे भूल जाउं। उनके इस ईमेल और उसमें लिखी हुई कविता को पढकर याद आता है वो दौर जब मैं और वे साथ थे। अगर ये कहूं कि वे मुझे कलम पकडना सिखा रहे थे तो कुछ गलत नहीं होगा। प्रस्‍तुत उस सुनहरे अध्‍याय की कुछ यादें---
नाकाबिल को काबिल बना दिया
मुझे पत्रका‍रिता का ककहरा सिखाने वाले राजेशजी थे और उन्‍होंने जो सिखाया उसका अनुसरण कर आज दैनिक भास्‍कर जैसे बैनर में काम कर रहा हूं। लेकिन दुख इस बात का है कि हमारे जैसे नौजवानों को राह दिखाने वाले चलते-फिरते संस्‍थान को एक ऐसा संस्‍थान नहीं मिल पा रहा है, जहां उनके सिद्वांतों को मानने वाला कोई हो । खैर स्थिति क्‍या रही होगी ये बता पाना मुश्‍िकल है लेकिन मैंने जो दो साल बादलजी के साथ बिताएं वे निश्चित ही मेरी पत्रकारिता के शैशवकाल के थे। वर्ष 2001 में जब आज तक चैनल लांच होने वाला था, उसी दरम्‍यान मेरा उनके साथ जुड़ना हुआ। 25 दिसम्‍बर 2000 को उनसे मेरा पहली बार सामना हुआ। मित्र घनश्याम के माध्‍यम से मैं उनसे मिला। जब पहली बार उन्‍हें देखा तो अपने मित्र से कहा कि यार यह तो वहीं बादलजी हैं जो टीवी पर दिखते हैं। तो मित्र ने मेरा कौतुहल शांत करते हुए कहा कि बिल्‍कुल ये वही बादलजी हैं जो टीवी पर आते हैं। बस इसके बाद सफर शुरु हो गया पत्रकार बनने का। पहला मौका मिला कैमरा असिसटेंट का, लेकिन मन में पत्रकार बनने की इच्‍छा बलवती जा रही थी। मेरे ख्‍याली पुलावों से बादलजी भी अनभिज्ञ नहीं थे इसलिए वे मुझे अच्‍छे से पढाई करने(उस समय में कालेज में था) का कहा करते थे। वे बार-बार कैमरे और एंगलों पर ध्‍यान देने का बोलते थे लेकिन मैं हूं कि अखबार पढने में और संपादक के नाम पत्र लिखने में खोया रहता था। उन्‍होंने शायद मुझमें कुछ देखा था इसलिए बिना कुछ कहे मुझे पत्रकार बनाने के गुर सिखाने लगे थे। हालांकि उस समय उनकी हर डांट मुझे बुरी लगती थी। लेकिन खुशी तब होती थी जब माखनलाल पत्रकारिता संस्‍थान के छात्र बादलजी से मिलने के लिए मुझसे प्राथर्ना करते थेतो मैं अपनी किस्‍मत पर रस्‍क करने लगता।। खैर समय बीतता गया और मैं धीरे-धीरे एक ठीकठाक कैमरामेन बनने की तरफ बढने लगा। इसी दरम्‍यान कुछ ऐसा‍ घटा कि मुझे उनका साथ छोडना पडा, लेकिन उनका हाथ मेरे उपर हमेशा रहा। उनकी हर डांट में प्‍यार था लेकिन उससे भी ज्‍यादा थी सीख और आज इस ब्‍लॉग के माध्‍यम से यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि बादलजी एक अच्‍छे पत्रकार तो हैं ही लेकिन उससे भी ज्‍यादा अच्‍छे हैं इंसान। निश्‍िचत रूप से वीओआई को उनकी कमी खलेगी और उससे भी ज्‍यादा कमी खलेगी वीओआई के स्‍टाफ को, क्‍योंकि उनका साथ छूटने के बाद मुझे भी उनकी कमी खली थी। उन्‍होंने नाकाबिल को काबिल बना दिया।
-भीमसिंह मीणा
भडास की खबर का मजमून
वीओआई के ग्रुप एडीटर बादलजी ने इस्तीफा दे दिया है। सूत्रों से मिली जानकारी के अऩुसार बादलजी पर वीओआई से स्टाफ कम करने को लेकर दबाव था जिसे उन्होंने एक हद तक तो स्वीकार किया लेकिन दबाव ज्यादा बढ़ने पर इस्तीफा देना उचित समझा। वीओआई के ग्रुप एडीटर पद पर साल भर के भीतर तीन लोग बैठ चुके हैं। शुरुआत में रामकृपाल सिंह थे। उनके बाद रविशंकर बनाए गए। बाद में रविशंकर को हटाकर राजेश बादल को ग्रुप एडीटर बनाया गया। सीईओ राहुल कुलश्रेष्ठ के इस्तीफे के बाद रविशंकर को सीईओ की जिम्मेदारी दी गई। अब बादलजी के ग्रुप एडीटर पद से इस्तीफा देने से वीओआई को काफी बड़ा झटका लगा है।
बादलजी के इस्तीफे को अप्रत्याशित माना जा रहा है। बादलजी प्रबंधन के साथ मिल-जुल कर काम करने और कराने में यकीन रखते थे। वीओआई के मालिकों के साथ बादलजी की नजदीकी को देखते हुए यह कयास लगाया जा रहा था कि वे लंबी पारी खेलेंगे। कई राज्यों में वीओआई के लिए कंटेंट के साथ-साथ बिजनेस मैनेज कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बादलजी के प्रैक्टिकल एप्रोच से स्टाफ और मैनेजमेंट दोनों प्रसन्न रहा करते थे।
बादलजी के जाने के बाद से माना जा रहा है कि वीओआई को संभाल पाना अब किसी के बूते की बात नहीं रही। वीओआई में लोग वैसे ही कई महीनों से बिना सेलरी के काम कर रहे हैं। मुंबई समेत कई ब्यूरो आफिसों से स्टाफ को या तो निकाला जा रहा है या फिर लोग खुद छोड़कर जा रहे हैं। संसाधनों के अभाव में चल रहे इस चैनल के लिए बादलजी का इस्तीफा काफी बड़ा झटका माना जा रहा है।
भड़ास4मीडिया की रिपोर्ट से इस बादलजी के इस्तीफे की पुष्टि हुई है.
बादलजी ने जुलाई 2008 में वीओआई ज्वाइन किया था। बादलजी ने इस्तीफा देने के बाद सभी वीओआईकर्मियों को मेल कर कुछ इस अंदाज में थैंक्यू कहा-
साथियों
जा रहा हूं। सबसे एक एक कर शायद न मिल पाऊं। माफ करिएगा। पर आपके साथ जो भी वक्त बीता, अच्छा रहा। बहुत कुछ सीखने को मिला। कई बार काम को लेकर गुस्से में कुछ कहा हो तो भूल जाएं। मेरे दिल में आप सभी को लेकर बेहद सम्मान है। जानबूझ कर मैंने आपको ठेस पहुंचाने का कोई काम नहीं किया। आप सबके सहयोग से इतने कम समय में पांच-छह चैनलों को शुरू कर पाए। अच्छी पत्रकारिता करने की कोशिश की। ये हमेशा याद रहेगा।
नया दिन होगा, नई रात होगी,
नए सिलसिले की शुरुआत होगी,
मुसाफिर हो तुम भी,
मुसाफिर हैं हम भी,
किसी मोड़ पर मुलाकात होगी.

Tuesday, February 03, 2009

लड़की पत्रकारिता की दहलीज पर!

नुक्कड़ की गीताश्री ने अपने ब्लॉग पर वरिष्ठ पत्रकार इरा झा का एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख को bhadas4media पर इस खुलेपन के साथ इन तंग गलियों में गुजर कैसे हो? पड़ने का मोका मिला। लेख को पड़ने के बाद में मन उथल-पुथल हो गई। खासतौर से यसवंत भाई की उस बात की लेख पड़ना शुरू करोगे तो पूरा पडोगे एकदम सार्थक हुई। मुझे लगा की ये लेख ख़ुद पड़ने के साथ संजोने योग्य है। वह इसलिए की में स्वयम एक पत्रकार हूँ और साड़ी बातों को शिद्दत से महसूस करता हूँ। में इस लेख के लिए तीन लोगो को धन्यवाद देना चाहूँगा। पहला गीताजी को जिन्होंने इतने सटीक लेख को प्रस्तुत किया और दूसरा धन्यवाद इराजी को जिन्होंने अपनी लेखनी से मीडिया की एक सच्चाई को सबके सामने रखा। और अंत में यसवंत भाई को जो सदेव जुझारू पत्रकारों को लिए बेहद उम्दा सामग्री उपलब्ध करते हैं।
प्रस्तुत है उक्त लेख के हुबहू अंश_
पोस्ट की शुरुआत में गीताश्री द्वारा लिखित भूमिका....
ये हैं अपनी इरा दीदी. पत्रकारिता के शुरुआती दौर में मुझ जैसी कई नई लड़कियो की प्रेरणा. हमने जब सोचा कि इस पेशे में जाएंगे तब तलाश शुरू हुई अपने आदर्श की. महिलाओं में चंद नाम ही थे सामने. उनमें एक इरा जी का भी था जो बाद में मेरी इरा दीदी बनी. अपने पेशे में उनकी संघर्ष गाथा का लोहा सभी मानते है. जुझारूपन उनके स्वभाव का हिस्सा है. इरा बहुत बेबाक हैं, मस्त हैं, बेहद खुली हुई, लेकिन अगर उन्हें गुस्सा आ जाए तो फिर आपकी खैर नहीं. प्यार और नफरत, दोनों हाथ से उड़ेलती हैं. इन दिनों एक किताब तैयार करते हुए मैंने उनसे एक लेख का अनुरोध किया और वे मान गईं. मेरे लिए ठीक-ठीक कह पाना तो मुश्किल है कि ऐसा क्यों हुआ, लेकिन लेख को पढ़ते हुए मुझे लगा कि किताब जब आए तब आए (किताब जल्दी ही आ रही है) उससे पहले इस लेख को सार्वजनिक किया जाना चाहिए. सो नुक्कड़ पर इरा झा का यह आलेख.
यह आलेख यूं तो एकवचन में है, लेकिन है बहुवचन के हिस्से का सच. मीडिया में एक अकेली स्त्री के संघर्ष और उसके जय-पराजय की यह कहानी केवल इरा झा के हिस्से की कहानी नहीं है, यह उन हजारों स्त्रियों की कहानी है जो देवघर से दिल्ली तक पुरुषों के वर्चस्व वाली इस दुनिया में अपनी सकारात्मक और सार्थक उपस्थिति दर्ज करा रही हैं.
-गीताश्री

गली बहुत तंग है
इरा झा
युवा माता-पिता की जिस जवां गोद में मैंने आंखें खोलीं वहां लड़की होने का कोई खास मतलब नहीं था. मेरे भी पैदा होने पर वैसे ही बंदूक चली थी जैसी मेरे इकलौते भाई की पैदाइश पर. संगी-साथी से लेकर सहपाठी तक छोकरे ही थे. इसलिए खेल-कूद और धमाचौकड़ी का अंदाज उन जैसा ही था. लड़कों को कूटा भी और कुटी भी पर लड़कपन को भरपूर जिया. उस पर रही-सही कसर घर पर बुजुर्गों की कमी ने पूरी कर दी. टोका-टाकी करने को घर पर न दादी, न नानी. उलटे परी-सी खूबसूरत मेरी चंचल मां और युवा पिता. जिन्हें बिनाका गीत माला सुनने की धुन चढ़ती तो नया रेडियो खरीद लाते. जमकर फिल्में देखते और देर रात तक बैठक करते. बेटियों की हर फरमाइश मुंह से निकलते ही पूरी होती. पूरे व्यक्तित्व में स्त्रियोचित गुणों की खासी किल्लत थी. ऊपर से नसीहत यह कि भला किस मामले में कमजोर हो.
पिता बस्तर जिले में बड़े वकील थे और उनकी कमाई उड़ाने को मेरी मां काफी थी. पिताजी को पाक कला में पारंगत अपनी पत्नी का किचन में घुसना गंवारा नहीं था. वजह यह नहीं कि रांधने में कहीं कमी थी. उन्हें किसी भी महिला का पकाने-खिलाने जैसे कामों में लगना वक्त की बर्बादी लगता रहा. मेरी मां अब से 40 बरस पहले भी बस्तर जिले की नामी सोशल वर्कर थी और इसी नाते बाल न्यायालय की ऑनरेरी मजिस्ट्रेट भी. जब भी मीटिंग के सिलसिले में वह तब के बस्तर से कई-कई ट्रेन बदलकर मुंबई-दिल्ली, भोपाल-जबलपुर अकेली घूमतीं पर न उन्हें कभी आवाजाही के लिए अपने पति की जरूरत महसूस हुई, न मेरे पिता कभी उन्हें लेकर असुरक्षित लगे. उन्हें बाहर जाने के लिए अपने पति से इजाजत की दरकार कभी नहीं रही, उनको सूचित कर देना ही काफी था. वह बस्तर के सुदूर गांवों में आदिवासी महिलाओं और बच्चों को हाईजीन का पाठ पढ़ातीं. उनके देहांत के बाद मुझे यह भी पता लगा कि आदिवासी महिलाओं के आपराधिक ट्रेंड पर उन्होंने बढ़िया अध्ययन किया था.
अब लगता है कि आदिवासी मसलों पर लेखन का यह रुझान शायद उन्हीं की देन है. यह माहौल ही था जिसकी बदौलत युवा होने पर भी हम चारों बहनों को कभी पाक कला में हाथ आजमाने या कढ़ाई, बुनाई-सीखने की नसीहत नहीं मिली. डटकर फैशन, खूब घूमना, पूरी दुनिया घूमे विद्वान पिता से अंतर्राष्ट्रीय कानून, एटॉमिक मसलों से लेकर गांधी फिल्म, पेटेंट उरुग्वे राडुंड तक की तमाम तकनीकी और प्रशासनिक पेचीदगियों पर दुनिया जहान की बातें, यही थी हमारी दिनचर्या. अब परिवार चलाते हुए कभी-कभार यह परवरिश खटकती जरूर है पर उस घर का माहौल ही कुछ ऐसा था, जूते पहनने से लेकर चोटी गुंथवाने या बाल काढ़ने तक के लिए लोग थे. वक्त ने हमें बदल दिया पर मेरे पिता को आज भी अपनी बहू का उन्हें दूध गरम करके देना सख्त नागवार गुजरता है.
पर यह परवरिश पिता की हैसियत के कारण नहीं थी. पूरे छत्तीसगढ़ में लड़कियों की परवरिश का कुछ ऐसा ही आलम है. पढ़ने की मनचाही आजादी, घरेलू कामकाज का दबाव नहीं पुरुषों से मेलजोल को लेकर कोई पूर्वग्रह नहीं, न ही शादी का दबाव. सबसे अहम है लड़की की पढ़ाई और स्वावलंबन. उसके कॅरियर के लिए पूरा परिवार कंप्रोमाइज करने को तैयार. स्त्री सुबोधिनी जैसी किसी चीज का अस्तित्व ही नहीं. छत्तीसगढ़ की आबो-हवा शायद 50 बरस पहले भी ऐसी थी और आज तो लड़कियों के हक में फिजा और खुशगवार है. उन्हें सेकेंड सेक्स का अहसास दिलाने वाले परिवार तब भी विरले थे और तब भी ऐसे लोगों को हेय दृष्टि से देखा जाता है. दिल्ली से बैठकर छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े इलाके की लड़कियों का अगड़ापन और आत्मविश्वास नहीं समझा जा सकता. एक बार वहां पहुंचकर कोई हकीकत से रूबरू हो तो कोई बात है.
उस पर मुझे तो बस्तर के उन अबूझे माड़िया-मुरियाओं का निपट आदिवासी परिवेश मिला जो रहन-सहन और संस्कारों के मामले में यूरोपीय समुदाय के देशों के बाशिंदों से भी ज्यादा एडवांस हैं; रहन-सहन के नाम पर मिनी स्कर्ट की तरह लपेटी गई साड़ी खुले स्तन (ये मातृत्व का प्रतीक हैं, सेक्स का नहीं) और लंगोटी लगाए पुरुष. घरेलू अर्थव्यवस्था की धुरी है वहां औरत. वह खेत में हल चलाती है. फसल बोती है, मछली पकड़ती है और इसे बेचने के लिए बाजार भी वही जाती है. पति की भूमिका है कमाऊ पत्नी के पीछे बच्चों की परवरिश. बल्कि एक तरह से बच्चों की पैदाइश में मदद की प्राकृतिक जरूरत पूरी करना. सारे कामों से निपटकर इन निपट देहाती औरतों का थकान मिटाने का अंदाज भी कुछ यूरोपीयन-सा है. महुए की शराब के नशे में धुत्ता होकर मर्दों के साथ राने जवां-राने जवां या रे रेला रेला रे बाबा की धुन पर सुबह होने तक थिरकना. पति की छाया बनकर घूमने का बंधन नहीं.
युवाओं के लिए तो पहले बाकायदे नाइट क्लब की तर्ज पर घोटुल हुआ करते थे. अविवाहित जोड़ों के लिए समझ लीजिए खास तरह के ट्रेनिंग सेंटर. यहां घर बनाने से लेकर दांपत्य जीवन के लिए जरूरी सभी तरह की शिक्षा. गोबर से आंगन लीपने से लेकर खाना रांधना और यौन शिक्षा तक. घोटुल के अंदर को ई यौन वर्जना नहीं होती थी और सचमुच प्रेमजाल में पड़कर किसी जोड़े के विवाह की नौबत आ जाए तो समझिए पूरी इज्जत के साथ हमेशा के लिए उनकी विदाई. विवाह हुआ नहीं कि जोड़ा घोटुल के लिए पराया हो गया. ऐसी भी मिसालें हैं जिसमें कई संतानों की मौजूदगी में जोड़े दांपत्य सूत्र में बंधे.
इन आदिवासियों के बीच जिंदगी का बड़ा हिस्सा गुजर गया. बैलाडीला की फूलमती और हिड़मे, कुटरू के जोगे, मादी, चंपी बिज्जे, कोंटा का बारे, किलेपाल का डोरा-डौका और मोलसनार का भूगोड़ी मांझी. इनके चेहरे और आवाज आज भी यादों में ऐसे बसे हैं जैसे आज की ही बात हो. न जाने कितने परिचित थे जिनके बीच स्कूली छुट्टियां, उन्हें एयरगन से चमगादड़, पंडूकी या हरियल मारकर भेंट करके कांटी. बस्तर के जंगलों में तब शिकार की तलाश में 12 बोर की बंदूक लिये घूमना भी बचपन का खास शगल था. कुटरू और मोलसनार के जंगलों में घूमकर बिताए दिन भला कैसे भुलाए जा सकते हैं. अपने आफत के परकाले मामाओं के साथ बस्तर और वैसे ही आदिवासी जिले मंडला में न जाने कितनी बार शेर से लेकर चीतल तक के शिकार में गई, याद नहीं. एक बात और बता दूं, इस शिकार प्रकरण को सलमान खान से न जोड़ें क्योंकि तब शिकार पर सरकारी रोक नहीं थी.
उस पर रही-सही कसर बस्तर के राजपरिवार में आवाजाही ने पूरी कर दी. राजा प्रवीरचंद भंजदेव, छोटे कुंवर, बड़े कुंवर, राजगुरु परिवार में तब जो देखा उसे बखानने बैठूं तो भरोसेमंद नहीं लगेगा. मुझे अच्छी तरह याद है बस्तर गोलीकांड में शहीद होने के बाद दुनिया भर में जाने जाने वाले महाराजा प्रवीरचंद के रहन-सहन का विलायती अंदाज, उनकी टूटी-फूटी हिंदी और अंग्रेजीदां महिला मित्र. कुंवर गणेश सिंह की पत्नी जिन्हें हम नानी कहते थे, की फिल्मी सितारे की-सी छवि. संगमरमर के टेबल पर अपनी लंबी उंगलियों में थमी सिगरेट के कश लगाते हुए पत्ते खेलना. उन्हीं के घर की शशि की मां (नाम याद नहीं) और ठुन्नू बाबा (शायद पद्मा नाम था उनका) महारानी हितेंद्र कुमारी के हाल्टरनुमा ब्लाउज. कुटरू जमींदारिन नानी की हाथी मार बंदूक. उनके वह शाहखर्च बेटे छत्रापाल शाह उर्फ बाबा जिन्होंने देश में सबसे कम उम्र में मंत्री बनने के साथ-साथ घर की पूरी प्रॉपर्टी अपने चेलों पर लुटाकर यह मिथक तोड़ा कि नेतागिरी कमाई का जरिया है. परलकोट जमींदारिन का पान की जुगाली करना.
समानता की मिसाल देखिए, बस्तर में लड़कियों को तब बाबा कहा जाता था. लड़की होने का अहसास तब भी नहीं जागा. पिता के तबादले के साथ शहर और कॉलेज बदले. यह जागरूकता तो इस दिल्ली ने दिलाई जिसे लोग महानगर कहते हैं. इसी महानगर में आकर जाना कि लड़कियों को दिन ढलने से पहले घर लौट आना चाहिए. लड़कियां बतातीं, मां ने फलां जगह जाने को मना किया है. शाम का शो नहीं देखना या मेरे भाई का जन्मदिन है, धूमधाम से मनेगा तो ताज्जुब होता. ये छोटी सोच का कैसा महानगर है.
अपने सेकेंड सेक्स होने का अहसास तब और गहराया जब पत्रकारिता में कुछ कर गुजरने का जज्बा मुझे पटना ले गया. 1984 की बात है. एक मुख्यमंत्री की मिल्कियत वाले अखबार में जब काम करने पहुंची तो पता लगा कि लड़की हूं लिहाजा रिपोर्टिंग कैसे कर सकती हूं. खासी हुज्जत के बाद रिपोर्टिंग मिली तो हजारों नसीहतें फलां से बात मत करना, फलां के साथ क्या कर रही थीं, मानों बात न हुई कोई स्कैंड्ल हो गया. उस पर आशियाने की तलाश में मेरी जाति से लेकर मेरा प्रोफेशन और उससे भी बढ़कर लड़की होना कैसे बाधक बना, अब सोचती हूं तो लोगों की बुध्दि पर तरस आता है.
दिल्ली में बैठे मेरे माता-पिता को यह तनिक भी अंदाज न होगा कि पटना जाकर मुझे क्या-क्या झेलना पड़ेगा. पर पटना का हर राह चलता इंसान जैसे मेरा जबरिया हमदर्द था. उन्हें यह बात हजम नहीं होती थी कि सिर्फ कॅरिअर और जज्बे की खातिर कोई मां-बाप अपनी युवा बेटी को एक अनजान शहर में जाने की छूट दे सकते हैं. लिहाजा वे अटकलें लगाते, बेचारी बहुत गरीब होगी. कहीं घर से भागी तो नहीं है. आम राय यही बनती है कि किसी आर्थिक तौर पर बेहद तंग परिवार की होने के कारण मुझे इतनी दूर नौकरी करनी पड़ रही है. लोग खोद-खोद कर मेरे परिवार का ब्यौरा मुझसे लेते और जब मैं बताती कि मेरे पिता भारत सरकार में बड़े ओहदे पर हैं तो वे ऐसे अविश्वास से देखते जैसे किसी पहले दर्जे की झूठी से पाला पड़ा है. मेरी जिंदगी के सफर का ये एक ऐसा पड़ाव था जिसने मुझे औरत होने की जमीनी हकीकत से रूबरू कराया. पटना पहुंच कर लगा जैसे लड़की होकर मैंने कोई पाप किया हो. इस नाते मेरी महत्वाकांक्षा का रास्ता शादी के गलियारे में भटक जाता है. आसपास की आंखों में मैं यह सवाल कि क्या मैं इलिजिबल हूं, साफ पढ़ लेती थी.
पटना के इस दमघोटूं माहौल की काली रातें जल्द कट गईं. एक राष्ट्रीय अखबार में मेरी नियुक्ति हो गई. मुझे जयपुर भेजा गया. नया शहर, नए साथी, मनपसंद काम और पटना से हटकर खुला-खुला माहौल. मेरे लिए तो जैसे जन्नत. पर जन्नत की ये खुशगवारी ज्यादा दिन न रह पाई. शहर में घरों के दरवाजे लड़की किराएदारों के लिए खुले थे. इसके पीछे तर्क ये था कि लड़कियां दंदी-फंदी नहीं होतीं. शराबखोरी और मंडली बाजी का लफड़ा नहीं. ऐसी आम सोच थी पर दफ्तर का माहौल तब भी उतना उदार न था. 25 लोगों के बीच दो लड़कियां. उस पर हमारे सर्वेसर्वा का पक्षपातपूर्ण रवैया. मेरी चाल-ढाल से लेकर काम-काज तक पर टिप्पणी और वजह शायद यह कि कभी बिना जरूरत उनसे मुखातिब नहीं हुई. कभी खुद के लड़की होने की दलील देकर कभी कोई फेवर नहीं मांगा. उलटे तब इस्तीफा देने पर आमादा हो गई जब पता लगा कि मेरा लिंग और कम उम्र मेरे कर्तव्य के रास्ते में बाधक है.
इसके सिर्फ दो मतलब थे पहला मेरे आचरण पर आशंका या मेरे साथियों के चाल-चलन पर भरोसा न होना. मानों मैं इन विश्वामित्रों की कर्तव्यपरायणता में कहीं रोड़ा न बन जाऊं. वह मामला कैसे निपटा और मैं कैसे काम पर लौटी इसकी एक अलग कहानी है. बहरहाल, इसी दफ्तर ने मुझे बताया कि लड़के और लड़की के बीच सिर्फ प्रेम हो सकता है, दोस्ती की बात बकवास है. नतीजतन मेरी दोस्तियों पर टीका-टिप्पणी के दौर चल पड़े और अपने एक सहयोगी से मैं शादी कर बैठी. आज भी उस घड़ी को कोसती हूं जब मुझ जैसे बेबाक इंसान पर माहौल हावी हो गया. मेरी परवरिश, मेरे जीवन मूल्य कभी मुझे ऐसी दहलीज पर ला खड़े करेंगे यह कभी सोचा न था. हालात कुछ ऐसे बने कि मुझे अपने ही अखबार के दिल्ली दफ्तर आना पड़ा.
दिल्ली में दिलों के दायरे और सिमटे हुए थे. जितना बड़ा दफ्तर उतनी छोटी सोच. दिल्ली दफ्तर में काम करने का मेरा खुमार चंद महीनों में उतर गया. काम का जज्बा तो वैसा ही था, पर लोग वैसे नहीं थे, जैसे पत्रकारिता में होने चाहिए. ऐसे लोगों की बड़ी तादाद थी जो लड़कियों की एक नजर के कायल थे, उनकी उम्र भर की ख्वाहिश होती कि एकांत में चाय के कप पर चंद लम्हे मिल जाएं. मुझे चाय पीने पर कोई आपत्ति नहीं थी, गिला इस बात का था कि ये सभी चाहते कि उनके बाकी साथियों को इसकी कानोकान खबर न हो.
एक वरिष्ठ साथी ने जब मुझसे कहा कि तुम कैंटीन पहुंचो, मैं आता हूं तो उनका रवैया मुझे बड़ा रहस्यमय लगा. मैंने इस गोपनीयता पर सवाल उठाने शुरू किए तो लोगों को खटकने लगी. एक और सज्जन की अक्सर मेरे साथ नाइट डयूटी लगती (या शायद वे लगवाते). इस दौरान वे मेरे दिमाग से लेकर रूप,गुण की तारीफ करते थकते नहीं. फलां रंग आप पर फबता है. फलां ड्रेस सूट करती है. आप चुप क्यों हैं, बोलते हुए अच्छी लगती हैं और एक बार सार्वजनिक तौर पर जब उन्होंने मेरे बातूनीपन पर सवाल उठा या कि आप इतना बोलती क्यों हैं और मेरे पलटकर उन्हीं की बात कहने पर उनके चेहरे का उड़ा रंग देखने वाला था. बस तभी से मैंने उनसे बोलचाल बंद कर दी.
इसी संस्थान ने मुझे बताया कि औरत होने के नाते मैं पुरुष साथियों की बराबरी करूं बल्कि बढ़-चढ़कर काम करूं तो भी मेरी सीमाएं हैं, मेरी सामर्थ्य हमेशा उनसे कमतर है. और मर्द होने के नाते उन्हें मुझे मोनिका लेविंस्की के फोटो दिखाकर आपस में अश्लील फब्तियां कसकर सताने का हक है. एडीशन निकालने से लेकर मेरी चाल-ढाल, व्यवहार तक में मुझे मेरी दोयम दर्जे की हैसियत का अहसास कराया जाता. इन हालातों के बीच मेरी परवरिश ने मुझे हमेशा पूरी ताकत और विश्वास से जूझने का हौसला दिया. मैं माहौल से परेशान अपनी साथिनों की तरह संस्थान छोड़कर भागी नहीं (जब तक कि उन्होंने मुझे निकाल न दिया). शायद यही वजह थी कि मैं कामयाबी की ऊंचाइयों की तरफ बड़ी तेजी से बढ़ रही थी. उस संस्थान में सबसे कम समय में दो प्रमोशन पाने की हैरतअंगेज मिसाल कायम करने वाली अकेली कर्मचारी थी पर मेरी यही काबिलियत, मेरा जुझारूपन लोगों के आंख की किरकिरी बन गया.
कल तक जो लोग कितनी प्यारी लड़की है, बड़ी मेहनती है, दौड़-दौड़कर काम करती है, कहते नहीं अघाते थे, दौड़ में मुझे अपने समानांतर पाते ही बहकने लगे. दरअसल, हमारी पारंपरिक परवरिश ने पुरुषों को लड़कियों को सिर्फ मातहत के तौर बर्दाश्त करना सिखाया है. बराबरी या वरिष्ठता की बातें उनके जीवन की सिर्फ मजबूरी है. पत्रकारिता की दुनिया में लड़की होना ऐसा गुनाह है, जिसकी कोई सीधी सजा नहीं है, सिर्फ घुट-घुटकर बर्दाश्त करने की नियति, काम आप करें क्रेडिट आपका पुरुष साथी ले जाए. वह सारी कवायद कुछ ऐसे पेश करे जैसे कर्ता-धर्ता वही और आप हक्के-बक्के पर इस दुनिया की ये दरीदंगियां भी मुझे अपने लक्ष्य से डिगा नहीं पाईं. आदिवासी जिले बस्तर की एक मामूली स्कूल की इस लड़की को बहुत आगे जाना था, पर स्वाभिमान से लगन और मेहनत से. कहीं कोई शार्टकट नहीं. लिहाजा लड़कर हमेशा अपने हिस्से का हक पाया. हिंदी पत्रकारिता में न्यूज डेस्क पर शायद उस समय पहली महिला चीफ सब-एडीटर थी.
अपने काम और मातहतों से भाई-बंदी के स्वभाव ने मेरे इतने प्रशंसक तैयार कर दिए थे कि विरोधी फौज मेरी खबरें फेंके या फोटो गायब करें पर एडीशन बिरले ही लेट हुआ होगा. पूरा सपोर्ट सिस्टम था मेरे पीछे. अब उस टीम के सामने यही चारा था कि सीधे आबरू पर हमला बोल दिया जाए. मुझे मेरी योग्यता और लोकप्रियता की एवज में जिस तरह जलील होना पड़ा और छोटी-छोटी और बड़ी से बड़ी अदालतों तक लड़ाई लड़ी उसकी अलग कहानी है. ऐसी कहानी जिससे न्यायालयों और मानवाधिकार की पैरोकार कंपनियों की पोल खुल जाए. इस पूरी लड़ाई के नतीजे के तौर पर मुझे नौकरी से निकाल दिया गया.
फिलहाल, देश के बड़े हिंदी अखबार में ठीक-ठाक पद पर हूं पर अब भी यही लगता है कि औरत के लिए यहां भी गली तंग है. बस्तर की परवरिश की वजह से अब भी ठठाकर हंसती हूं, साथियों से ठिठोली करती हूं और जोर से नाराजगी दिखाती हूं. लेकिन इसमें बस्तर के दिनों की स्वच्छंदता नहीं है. मेरे पिता से विरासत में मिली आजादी नहीं है. काश कि मेरे पिता यह जान पाते की उनकी बेटी जिस दुनिया में गुजर कर रही है वहां औरतों की बेबाकी सिर्फ कंटेंट है.
यहां अरुंधति राय या किरण बेदी के सिर्फ इंटरव्यू छप सकते हैं वे खुद आ जाएं तो उनकी हालत पुलिस की नौकरी से कोई खास अलग न होगी. औरतों की बेबाकी यहां अब भी बड़बोलापन है. यहां औरतों को फैशनपरस्ती पर लिखने की तो छूट है पर ठाठ-बाट से रहना ऐसी आभिजात्य की निशानी है जिससे ज्यादातर लोगों का बैर है. बस काम किए जाइए और लोगों को क्रेडिट लेने दीजिए. फल की चिंता से बेपरवाह आपने अपने हक का सवाल उठाया नहीं कि न जाने कितनी आवाजें किस्सागोइयों के साथ कितने कोनों से उभरेंगी और आपके बुलंद हौसलों को मटियामेट कर देंगी. हिंदी पत्रकारिता का यही उसूल है. औरत कराहे तो वाह-वाह और आवाज उठाए तो-? ऽऽ मैंने कहा न, यहां की गलियां बड़ी तंग हैं पर पूरे माहौल में मैं अब भी और औरतों से अलहदा हूं. मेरी यह उन्मुक्तता किसे कैसी लगती यह साफ पढ़ लेती हूं. इस खुलेपन के साथ इन तंग गलियों में गुजर कैसे हो, पता नहीं, यह कब सीख पाऊंगी?

Thursday, January 15, 2009

पत्रकार अच्छे राजनेता हैं कोई शक?

मेरे दोस्त और वरिष्ठ पत्रकार सचिन के एक-एक शब्द में सच्चाई है और उनके शब्द सोचने के लिए भी मजबूर करते हैं। में ये टिप्पणी उनके ब्लॉग पर भी लिख सकता था, लेकिन ऐसी बहुत सी बातें हैं जो दिल में थी और सचिन भाई के ब्लॉग सचिन की दुनिया पर राजनीति तो करनी ही पड़ेगी यारों पड़कर वे बातें फ़िर से जेहन में घूमने लगी है। कभी में भी राजनीति को पसंद करता था लेकिन समय का चक्र घूमा और में राजनीति की बजाय
पत्रकारिता में में आ गया लेकिन राजनीति करने की भड़ास दिल में दबी थी। उस भड़ास को निकालने के लिए कई बार कोशिश भी की लेकिन दोस्तों हर बार समय एसा आया जिसने मुझे पत्रकारिता और राजनीति में से एक कोई चुनने के विकल्प दिए और हर बार पत्रकारिता जीत गई।
लेकिन राजनीति में युवाओ को आना चाहिए इस बात को हमेशा सबसे ऊपर रखूंगा। दरअसल हम सभी ये सोचते हैं की फला व्यक्ति अच्छा राजनेता साबित हो सकता है क्योंकि हम वेसा नही बनना चाहते है। अब सवाल की हम पत्रकार क्या कर सकते हैं शायद हम अच्छे राजनेता खोज सकते हैं और उन्हें प्रोत्साहित कर सकते हैं और एक अच्छे राजनेता की तरह देश के लिए काम कर सकते हैं।
फिलहाल देश के पास राजनेता नही हैं और एसा होता तो उमा भारती और कल्याण सिंह को शेखावत का पल्लू नही पकड़ना पड़ता?

Tuesday, January 13, 2009

मरने से पहले sms भेज कर गहना को बचा लीजिये?

गहना को माँ बनना चाहिए या नही ये तो बालिका वधु के निदेशक तय करेंगे लेकिन sms के जरिये जो परिणाम सामने आ रहे हैं उससे तो लगता है की देश की जनता नही चाहती है की गहना माँ बने।
अफ़सोस तब होता है जब sms भेजने वाले के पड़ोस में कोई गहना माँ बन जाती है और हम sms करते हैं मगर इस बात का की एक नाबालिग माँ बन गई है और उसकी मौत हो गई है और उसका पैदा बच्चा भी ख़त्म हो गया है।
शायद पड़ोस में मरने वाली गहना की मौत पर हम आंसू भी बहा लेते होंगे लेकिन जिस गहना की ख़बर अख़बार में छपती है उसकी मौत पर आंसू बहाना तो दूर चर्चा करने की फुरसत हमारे पास नही होती है। अभी सीरियल ख़त्म हुआ तो पडोसियों में गहना के माँ बनने को लेकर बहस छिड़ गई लेकिन ये बहस पड़ोस में मरने वाली गहना की मौत पर छिडेगी ?

हर तारीख पर नज़र

हमेशा रहो समय के साथ

तारीखों में रहता है इतिहास